सावन और भगवान शिव: रुद्राभिषेक से जुड़ा एक किस्सा

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सावन और भगवान शिव: रुद्राभिषेक से जुड़ा एक किस्सा

सावन और भगवान शिव रुद्राभिषेक से जुड़ा एक किस्सा

रुद्राभिषेक का मतलब क्या होता है?

हर साल जब बारिश की पहली बूंद ज़मीन पर गिरती है, मिट्टी की खुशबू दिल को गहराई से छू जाती है। वहीँ कहीं भीतर से एक पुरानी, जानी-पहचानी सी पुकार उठती है “बोल बम!” ये महज एक धार्मिक नारा नहीं, बल्कि करोड़ों दिलों की श्रद्धा की आवाज़ है।

सावन आते ही मन अपने आप ही भगवान शिव की ओर मुड़ जाता है। और शायद यही वो महीना है, जब इंसान अपने अस्तित्व, अपने दुखों, अपनी उम्मीदों और अपने प्रश्नों को शिव के सामने बेझिझक रख देता है।

एक मां और उसके बेटे की कहानी 

भोपाल की एक साधारण सी कॉलोनी में रहने वाली सुनीता देवी, पिछले 10 सालों से हर सावन में रुद्राभिषेक करवाती हैं। वजह? उनका बेटा अजय एक वक्त ICU में था। डॉक्टरों ने कह दिया था उम्मीद कम है।
सुनीता ने कुछ नहीं कहा, बस घर आकर एक छोटा सा शिवलिंग दूध से धोया, बिल्वपत्र चढ़ाया और रोते-रोते सिर्फ एक बात कही हे शिव, मेरा बेटा तुझसे बढ़कर नहीं है। जो सही हो, वही करना।

और चमत्कार... नहीं, कहिए विश्वास हुआ।

अजय आज जॉब कर रहा है, ठीक है। सुनीता अब हर साल सावन में रुद्राभिषेक करवाती हैं, जैसे वो शिव से एक रिश्ते को निभा रही हों। यह कोई डील नहीं थी, यह भक्ति थी। भाव था। और यही रुद्राभिषेक का असली मतलब है शिव से बात करना, मन की बात कहना। 

सावन का मतलब सिर्फ व्रत नहीं ये आत्मा की तपस्या है

कई लोग सोचते हैं कि सावन में व्रत रखना, जल अर्पित करना, दूध चढ़ाना, ये सब अंधविश्वास है। पर अगर आप कभी किसी शिवभक्त की आंखों में वो श्रद्धा देख लें, तो सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं रह जाती।

सावन वो समय है जब आदमी अपने क्रोध को पानी में बहा देता है। औरतें अपनी इच्छाओं को शिव की जटाओं में समर्पित कर देती हैं। बच्चे भी ‘ओम नम: शिवाय’ बोलते हुए पूजा में घंटों बैठ जाते हैं। यह महीने की बात नहीं है। ये उस मौन की बात है जो अंदर की बेचैनी को शांत करता है।

रुद्राभिषेक क्यों? सिर्फ परंपरा नहीं, आत्म-शुद्धि है

रुद्राभिषेक का शाब्दिक अर्थ है रुद्र (शिव) का अभिषेक। पर असल अर्थ?
अपने अहंकार, अपने दुःख, अपने डर और अपने स्वार्थ को शिव पर अर्पित करना।

आपने देखा होगा दूध, शहद, दही, घी, गंगाजल... सब शिवलिंग पर चढ़ाए जाते हैं।
पर असल में ये सब प्रतीक हैं
दूध = मासूमियत
शहद = मीठी वाणी
घी = आत्मा की शक्ति
गंगाजल = पवित्रता

जब ये सब मिलकर शिव पर चढ़ते हैं, तो हम खुद को खाली करते हैं ताकि शिव हमें भर सकें।

शिव जो खुद भिक्षुक हैं, पर सारा ब्रह्मांड जिनका ताज है

शिव से बड़ा विरोधाभास कोई नहीं। वो तपस्वी भी हैं, गृहस्थ भी। वो संहारक भी हैं, और पालनहार भी। उन्हें सोना नहीं चाहिए, सिर्फ एक लोटा जल चाहिए वो भी सच्चे मन से। और शायद इसी वजह से सावन में हर दिल उन्हें याद करता है। क्योंकि शिव हमें वैसे ही स्वीकारते हैं जैसे हम हैं।

 क्या आपने कभी शिव से मन की बात की है?

अगर नहीं की, तो इस सावन एक बार कर के देखिए।
कहीं जाना नहीं, बस आंखें बंद करके कहिए
हे भोलेनाथ, मैं तुझसे कुछ नहीं मांगता। बस तू साथ रहना।

  जीवन में सिर्फ इतना ही काफी होता है।

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