बिना पति के विराजमान माता सीता
कहा जाता है दुनिया में जितने भी भगवान राम के मंदिर हैं, सभी जगह भगवान राम के साथ माता सीता,लक्ष्मण और हनुमान जी की प्रतिमाएं एक साथ विराजमान हैं परंतु यह पूरी दनिया में यह एक ऐसा मंदिर हैं जहां माता सीता बिना अपने स्वामी के विराजमान हैं। मान्यता है कि रामायण काल के दौरान जब भगवान राम रावण का वध करके अयोध्या आए तो सीता माता के चरित्र पर सभी ने बहुत उंगलियां उठाई थी। जिसके बाद भगवान राम ने माता सीता का त्याग कर दिया था। तब माता सीता ने करीला पहाड़ी पर स्थित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शरण ली थीं। यहीं पर उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया था।
तभी से इस स्थान पर रंगपंचमी के मौके पर मेला लगता हैं और पहाड़ी पर स्थित महर्षि वाल्मीकि की गुफा खोली जाती है। उस समय देश के हर कोने से श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर आते हैं।
करीला धाम में इस नृत्य का है विशेष महत्व
रामायण के अनुसार बताया जाता है कि रंगपंचमी के दिन करीला गांव में स्थित वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश का जन्म हुआ था। महर्षि वाल्मीकि ने बड़े धूमधाम से उनका जन्मदिन मनाया था। इस उत्सव में बेड़नियां जाति की हजारों नृत्यांगनाएं जमकर नाची थीं। तब से हर साल रंगपंचमी के दिन मेला लगता है और लाखों की संख्या में श्रद्धालु माता सीता,लव-कुश और महर्षि वाल्मीकि के दर्शन करने आते है।मन्नत पूरी होते ही करते है सब ये काम!
प्राचीन परंपरा के अनुसार, करीला धाम में जो भी मन्नत मांगते हैं वह पूरी हो जाती है। मन्नत पूरी होने के बाद, लोग राई नृत्य करवाते हैं। कहा जाता है कि यहां नि:संतान दंपत्ति की झोली माता सीता भर देती हैं। इसके बाद लोग राई नृत्य करवाते हैं।