Janmashtami celebration: शहरों में भुलाई जा चुकी परंपराएं,मखाणु गांव में आज भी ज...

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Janmashtami celebration: शहरों में भुलाई जा चुकी परंपराएं,मखाणु गांव में आज भी जीवंत हैं... जहां बहनें कनूडे रमती हैं और कृष्ण भक्ति में डूब जाती हैं।

janmashtami celebration शहरों में भुलाई जा चुकी परंपराएंमखाणु गांव में आज भी जीवंत हैं जहां बहनें कनूडे रमती हैं और कृष्ण भक्ति में डूब जाती हैं।

Janmashtami celebration: गुजरात के बनासकांठा ज़िले के दियोदर तालुका स्थित मखाणु गाँव में आज भी एक अनोखी और पारंपरिक परंपरा को संजोकर रखा गया है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई और लोक जीवन की सुंदरता को दर्शाती है। इस परंपरा के अनुसार, गोकुल अष्टमी यानी जन्माष्टमी के पर्व पर गाँव की महिलाएँ और युवतियाँ "कनूडे रमती" हैं, जिसका अर्थ है भगवान कृष्ण की भक्ति में खो जाना।

[caption id="attachment_100619" align="alignnone" width="300"]Janmashtami celebration Janmashtami celebration[/caption]

Janmashtami celebration:"कनुड़ा गीत" गाकर उत्सव में डूब जाती

यह परंपरा आधी रात से शुरू होती है, जब गाँव की बहनें झील से मिट्टी लाकर श्रीकृष्ण और राधाजी की मूर्तियाँ बनाती हैं। यह मिट्टी, जिसे पवित्र माना जाता है, ग्रामीण जीवन और प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाती है। मूर्तियाँ बनाने के बाद महिलाएँ पारंपरिक देसी ढोल की थाप पर रास-गरबा खेलती हैं और "कनुड़ा गीत" गाकर उत्सव में डूब जाती हैं।

Janmashtami celebration: सामुदायिक भावना और मेलजोल को बल मिलता है

कनूडे रमवानी यह परंपरा न सिर्फ आध्यात्मिक महत्व रखती है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर को भी मजबूत करती है। महिलाएँ पारंपरिक पोशाक में सज-धजकर एक-दूसरे के साथ गीत-संगीत और नृत्य का आनंद लेती हैं, जिससे सामुदायिक भावना और मेलजोल को बल मिलता है।

Janmashtami celebration: सांस्कृतिक समृद्धि को जीवित रखती

इस वर्ष भी मखाणु गाँव की बहनें पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ जन्माष्टमी मनाती नज़र आईं। झील से मिट्टी लाना, प्रतिमाएँ बनाना, और ढोल की धुन पर गरबा खेलना—ये सभी क्रियाएं आधुनिकता के दौर में भी ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक समृद्धि को जीवित रखती हैं।

आज जब शहरी जीवन में त्योहार महज रस्म बनकर रह गए हैं, ऐसे में मखाणु जैसे गाँवों की यह परंपरा एक मिसाल है कि भारतीय संस्कृति आज भी जड़ों से जुड़ी हुई है। यह आयोजन सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि एक सामाजिक और आध्यात्मिक पुनर्मिलन का माध्यम बन जाता है।

संवाददाता: ललित दरजी बनासकाठा

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