खनिज संशोधन विधेयक पर झारखंड में तनाव

खनिज विधेयक पर हेमंत सोरेन का राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को पत्र, बोले- झारखंड को हर साल हजारों करोड़ के राजस्व का नुकसान

झारखंड में खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विरोध किया, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर संवैधानिक और वित्तीय प्रभावों पर चिंता जताई।

By : रोहन उमक
खनिज विधेयक पर हेमंत सोरेन का राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को पत्र, बोले- झारखंड को हर साल हजारों करोड़ के राजस्व का नुकसान

खनिज विधेयक पर हेमंत सोरेन का राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री को पत्र, बोले- झारखंड को हर साल हजारों करोड़ के राजस्व का नुकसान

खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर झारखंड में सियासी हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रस्तावित संशोधन का विरोध करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है। उन्होंने विधेयक के संवैधानिक, संघीय और वित्तीय प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है। मुख्यमंत्री ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी पत्र भेजकर मामले में हस्तक्षेप करने और विरोध में सहयोग का अनुरोध किया है।

झारखण्ड सीएम हेमंत सोरेन

राज्य के उपकर अधिकार पर जताई आपत्ति

राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में सोरेन ने प्रस्तावित संशोधन के उस प्रावधान पर आपत्ति जताई है, जिसके तहत एमएमडीआर अधिनियम में धारा 9-डी जोड़ने का प्रस्ताव है। इसके मुताबिक, राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज वाली भूमि पर किसी तरह का कर, उपकर (सेस) अथवा अन्य लेवी केवल केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन ही लगा सकेंगी।

मुख्यमंत्री के अनुसार, इस प्रावधान का असर पहले से लगाए गए ऐसे उपकरों के बकाया दावों पर भी पड़ सकता है। उन्होंने इसे राज्य के वित्तीय अधिकारों और संघीय ढांचे से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।

खनिज संशोधन विधेयक

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के उस फैसले का उल्लेख किया, जिसमें मिनरल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड मामले में राज्यों के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण व्यवस्था दी गई थी।

मुख्यमंत्री के मुताबिक, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के तहत राज्यों को खनिज वाली भूमि पर कर या उपकर लगाने का अधिकार है। अदालत ने यह भी माना था कि खनिज का मूल्य या उत्पादन कर निर्धारण का आधार हो सकता है।

इसी फैसले के आधार पर झारखंड विधानसभा ने झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस एक्ट, 2024 पारित किया था और इसके तहत नियम भी अधिसूचित किए गए।

सुप्रीम कोर्ट

‘कानून का मकसद सिर्फ राजस्व जुटाना नहीं’

सोरेन ने कहा कि राज्य का सेस कानून कोई प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप विधानसभा द्वारा बनाया गया कानून था। इसका उद्देश्य केवल सरकारी खजाने में राजस्व बढ़ाना नहीं, बल्कि खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाना भी था।

मुख्यमंत्री ने बताया कि इन संसाधनों का इस्तेमाल सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण आधारभूत ढांचे और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए किया जाना प्रस्तावित था।

आदिवासी क्षेत्रों और विकास योजनाओं पर असर की आशंका

हेमंत सोरेन ने आशंका जताई कि यदि प्रस्तावित संशोधन लागू होता है और राज्य की उपकर लगाने की शक्ति सीमित या समाप्त कर दी जाती है, तो झारखंड को हर साल हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व से हाथ धोना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि खनन प्रभावित इलाकों, खासकर आदिवासी समुदायों को पहले से ही विस्थापन, भूमि से वंचित होने, पर्यावरणीय नुकसान, प्रदूषण, पारंपरिक आजीविका के संकट और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में राज्य के राजस्व संसाधनों पर असर इन क्षेत्रों के विकास और कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावित कर सकता है।

विरोध में बड़े आंदोलन की तैयारी

मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से विधेयक के संवैधानिक, संघीय, वित्तीय और सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करने की अपील की है। वहीं, इस प्रस्तावित कानून के विरोध में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने भी बड़े आंदोलन की तैयारी शुरू कर दी है। ऐसे में खनिज अधिकार और राज्य के राजस्व से जुड़ा यह मुद्दा आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में और तूल पकड़ सकता है।

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