Chaitra Navratri 4th Day: चैत्र नवरात्रि 2026 की शुरुआत 19 मार्च से हो चुकी है, आज नवरात्रि का चौथा दिन है। यह दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप देवी कुष्मांडा को समर्पित होता है। में चैत्र नवरात्रि को नये वर्ष के रुप में भी मनाया जाता है। आइए जानते हैं कि, चैत्र नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा से जुड़ी व्रत कथा और पूजा विधि…
कैसे करें माता रानी की पूजा?
चैत्र नवरात्रि 2026 का चौथा दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरुप मां कुष्मांडा का दिन होता इस दिन पहले सुबह उठकर स्नान करें। फिर हाथों में पुष्प लेकर मां को प्रणाम करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। फिर माता रानी की पूजा करें। मां कुष्मांडा की कथा सुने और मंत्रों का जाप करें। फिर मां की आरती उतारकर उन्हें भोग लगाएं। फिर सबको प्रसाद बांटें।
शास्त्रों के मुताबिक, मां कुष्मांडा ने अपनी मुस्कान से ब्रह्माण की रचना की है, इनके आशीर्वाद से सेहत, ऊर्जा और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

प्रिय रंग और प्रिय भोग
हरे रंग का भोग मां कुष्मांडा को अति प्रिय होता है, इस दिन हरे रंग के फल जैसे केले, अंगूर का भोग लगाएं, माता को मालपूए भी अति प्रिय होतें हैं, कहा जाता है कि, माता के मन पसंद भोग लगाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
वहीं मां को नारंगी, पीला और हरा रंग अति प्रिय होता है, कहा जाता है, ये तीन रंग ऊर्जा, प्रसन्नता और गति के प्रतीक होते हैं।

मां कुष्मांडा देवी मंत्र
मां कुष्मांडा देवी की पूरी विधि-विधान से पूजा करने के बाद इस मंत्र का जाप करें..
या देवी सववभू तेषु मां कू ष् मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। मंत्र का 108 बार जाप करें।
मूल मंत्र: ॐ देवी कुष्माण्डायै नमः
बीज मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः
स्तुति मंत्र: सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
ध्यान मंत्र: वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्मांडा यशस्वनीम्॥
मां कूष्मांडा व्रत कथा
देवी दुर्गा के चौथे स्वरूप के रूप में पूजनीय मां कूष्मांडा अपनी मंद और दिव्य मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली मानी जाती हैं। इसी वजह से उन्हें “कूष्मांडा” नाम दिया गया।
पुराणों के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल अंधकार ही व्याप्त था, तब मां कूष्मांडा ने अपनी एक हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इस कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति और आदिस्वरूपा भी कहा जाता है।

अष्टभुजाओं में इन चीजों से सुशोभित
मां कूष्मांडा अष्टभुजा स्वरूप में विराजमान हैं। उनके आठ हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, चक्र, गदा और जपमाला सुशोभित हैं। जपमाला उनके भक्तों को सभी सिद्धियां और निधियां प्रदान करने वाली मानी जाती है।
उनका वाहन सिंह है, जो शक्ति और साहस का प्रतीक है। मां को कुम्हड़ा (कद्दू) अत्यंत प्रिय है, इसलिए उनकी पूजा में कुम्हड़े का विशेष महत्व बताया गया है।
मां कूष्मांडा का निवास सूर्य मंडल के भीतर माना गया है। वे ही एकमात्र देवी हैं जिनमें सूर्य लोक में निवास करने की अद्भुत शक्ति है। उनके शरीर की आभा और तेज सूर्य के समान ही प्रखर और दैदीप्यमान है।
मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों को आरोग्य, बल, यश और आयु की प्राप्ति होती है तथा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
