Jakh Devta Mela Guptkashi: उत्तराखंड की केदारघाटी के गुप्तकाशी जाखधार में पारंपरिक जाख मेला दहकते अंगारों पर नर पश्र्वा (देव रूप में व्यक्ति) के नृत्य के साथ संपन्न हो गया। इस साल भगवान जाख ने 3 बार अग्निकुंड में प्रवेश कर भक्तों को आशीर्वाद दिया। यह मेला आस्था और आध्यात्म का अद्भुत संगम है।

अनोखी परंपरा
यह मेला सालों से चली आ रही एक अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है, जहां विशाल अग्निकुंड के धधकते अंगारों पर नर पाश्र्व नृत्य करते हुए भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। ढोल-दमाऊ, भोंपू और जाख देवता के जयकारों के बीच यह देव नृत्य केदारघाटी का विस्मयकारी अनुभव है। यह आयोजन हर वर्ष आस्था और परंपरा के साथ मनाया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
अंगारों पर नृत्य
सबसे पहले नर देवता को उनके मूल गांव से देवशाल स्थित विंध्यवासिनी मंदिर तक ले जाया जाता है। विंध्यवासिनी मंदिर की परिक्रमा पूरी करने के बाद जाख की कंडी और जलते दीए के साथ मंदिर की ओर प्रस्थान किया जाता है। मंदिर पहुंचने पर बांज के पेड़ के नीचे ढोल की थाप पर देवता अवतरित होते हैं। देव स्वरूप में आने के बाद मंदिर में तांबे की गागर में भरे पवित्र जल से देव को स्नान कराया जाता है। इसके बाद नर देव पूरे दहकते अंगारों पर 3 बार नृत्य करते हैं और उपस्थित भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

Jakh Devta Mela Guptkashi: अग्निकुंड में प्रवेश
हर तरफ ढोल-दमाऊं, भोंपू और “जाख देवता की जय” के जयकारों की गूंज सुनाई देती है। यह संगीत और ध्वनि पूरे माहौल को और ज्यादा ऊर्जावान बना देती है। भक्त भाव-विभोर होकर इस देव नृत्य को देखते हैं और खुद भी भक्ति में लीन नजर आते हैं। पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए देवता को पूजा के बाद अग्निकुंड तक लाया जाता है। देव स्वरूप में आने के बाद उन्हें जल से स्नान कराया जाता है और फिर वे अग्निकुंड में प्रवेश कर आशीर्वाद देते हैं।
क्या है मान्यता?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद मोक्ष की कामना से केदारनाथ धाम जाने से पहले द्रौपदी सहित पांडवों ने इस स्थान पर विश्राम किया था। जब द्रौपदी को प्यास लगी, तो उन्होंने पांडवों से जल लाने का आग्रह किया। भीम और उनके 3 भाई जब जल लेने गए, तो भगवान यक्ष ने उनसे प्रश्न पूछे। प्रश्नों का उत्तर न देने पर यक्ष ने पांडवों के 4 भाइयों को मृत्यु का श्राप दे दिया था। कुछ देर बाद सत्यवादी युधिष्ठिर जब जल कुंड के पास आते हैं, तो अपने भाइयों की दुर्दशा देकर दुखी होते हैं । जैसे ही भगवान यक्ष उनसे भी वही प्रश्न करते हैं, जिसका उत्तर युधिष्ठिर दे देते हैं। खुश होकर भगवान सभी पांडवों को पुनर्जीवित कर देते हैं। वहां पर जल मान्यताओं के अनुसार जल कुंड था, जो वर्तमान में मानवों की ओर से निर्मित अग्निकुंड में परिवर्तित हो गया है।
