Why is Datura offered to Lord Shiva: हिंदू धर्म में भगवान शिव को भोलेनाथ, औघड़दानी और देवों के देव महादेव के नामों से जाना जाता है। वे सृष्टि के संहारक और योगियों के आदिनाथ माने जाते हैं। सावन मास, सोमवार और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर शिव भक्त विशेष रूप से शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, भांग और धतूरा अर्पित करते हैं। इनमें से धतूरा एक ऐसा फल है जिसे विषैला और जहरीला माना जाता है, लेकिन फिर भी इसे भगवान शिव पर चढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
क्या आपको पता है कि धतूरा शिव को क्यों प्रिय है? इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथा या आध्यात्मिक रहस्य है? आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यताओं, धार्मिक महत्व और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को।
धतूरा क्या है?
धतूरा एक विषैला पौधा होता है, जिसकी पत्तियां, फल और बीज जहरीले माने जाते हैं। इसे “सफेद धतूरा” या “काला धतूरा” नाम से भी जाना जाता है। आयुर्वेद में इसका प्रयोग विशेष सावधानी के साथ औषधियों के रूप में किया जाता है, लेकिन अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह जानलेवा भी हो सकता है।

पौराणिक मान्यता: समुद्र मंथन और हलाहल विष…
शिव पर धतूरा चढ़ाने का सबसे प्रमुख कारण समुद्र मंथन से जुड़ी पौराणिक कथा है। कथा के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया, तो सबसे पहले हलाहल नामक विष बाहर आया। यह विष इतना घातक था कि पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकता था।
तब भगवान शिव ने संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा के लिए इस विष को पी लिया और उसे अपने कंठ में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ कहा गया।
चूंकि यह विष अत्यंत गर्म और तीव्र प्रभाव वाला था, इसलिए उसे शांत रखने के लिए भगवान शिव को ठंडी और विषहर चीजें अर्पित की जाने लगीं — जैसे जल, दूध, भांग, बेलपत्र और धतूरा।
धतूरा विष का प्रतीक है, और उसे शिव पर चढ़ाना उनके विषपान की स्मृति और सम्मान के रूप में देखा जाता है।

शिव का औघड़ रूप और धतूरा…
भगवान शिव को औघड़नाथ भी कहा जाता है, जो साधारण और सहज वस्तुओं को स्वीकार करते हैं। वे किसी भी आडंबर या भव्यता के मोह में नहीं रहते।
धतूरा एक ऐसा फल है जिसे आमतौर पर कोई नहीं खाता और जिसे अशुद्ध माना जाता है। लेकिन शिव का स्वरूप ही ऐसा है कि वे संसार के त्यागी, साधु और योगियों के प्रतीक हैं, इसलिए उन्हें भी ऐसी वस्तुएं प्रिय हैं जो सामान्य, सहज, और अप्रसिद्ध हों।
धतूरा, शिव के इस वैराग्यपूर्ण और तात्त्विक स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। यह यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, भावना में होती है।

तंत्र साधना में धतूरा का महत्व…
भगवान शिव को तंत्र और योग के अधिपति भी माना जाता है। तांत्रिक साधनाओं में धतूरा का विशेष स्थान है।
माना जाता है कि धतूरा में नकारात्मक ऊर्जा को सोखने और शक्ति को केंद्रित करने की क्षमता होती है। कई तांत्रिक और योग साधक शिव की आराधना के समय धतूरा चढ़ाते हैं ताकि साधना सफल हो और ऊर्जाओं का संतुलन बना रहे।
इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो धतूरा शिव की उस रूप की आराधना का प्रतीक है, जिसमें वे संहारक, रक्षक और तपस्वी तीनों स्वरूपों में समाहित हैं।
धतूरा चढ़ाने का आध्यात्मिक संदेश…
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से धतूरा चढ़ाने का अर्थ है –
“विषैला भी हो, तो जब वह समर्पित होता है, तो शिव उसे भी स्वीकार करते हैं।”
यह एक गूढ़ आध्यात्मिक विचार है कि व्यक्ति अपने भीतर के दोष, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या जैसे विषों को शिव को अर्पित कर सकता है। शिव उन दोषों को अपने भीतर समाहित कर उन्हें शांत करते हैं और भक्त को शुद्ध करते
