क्या ईश्वर को दी गई ज़मीन अब सरकार ले सकती है?
जब धर्म और संविधान आमने-सामने हों
क्या कोई ज़मीन जिसे इंसान ने ईश्वर को समर्पित किया हो, अब सरकार अपने अधिकार में ले सकती है? क्या ये केवल कानूनी मसला है या आस्था से जुड़ा सवाल?
आज सुप्रीम कोर्ट इस बेहद संवेदनशील और बहुचर्चित सवाल पर फैसला सुनाने जा रहा है, जो मुस्लिम समाज के धार्मिक अधिकारों, संविधान की व्याख्या और राज्य की शक्तियों से जुड़ा है।
वक्फ: सिर्फ ज़मीन नहीं, एक परंपरा, एक भावना
वक्फ का मतलब होता है किसी संपत्ति को ईश्वर के नाम पर समर्पित कर देना, ताकि वो समाज की भलाई में इस्तेमाल हो। मस्जिद, कब्रिस्तान, मदरसे, अनाथालय, या कोई भी परोपकारी उद्देश्य इसके तहत आता है।
कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलील दी
वक्फ सिर्फ ज़मीन नहीं, यह परलोक के लिए एक सौंपा गया भाव है।
लेकिन सरकार का कहना है कि वक्फ इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रथा है, जिसे 1954 के कानून के तहत मान्यता दी गई थी और जिसे अब बदला जा सकता है।
तीन दिन चली सुनवाई, पांच याचिकाएं, एक ऐतिहासिक सवाल
22 मई को सुप्रीम कोर्ट ने तीन दिन की गहन सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब आज, 15 सितंबर को ये फैसला आएगा।
केंद्र की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा
वक्फ कोई मौलिक अधिकार नहीं है, इसे संसद ने बनाया और संसद ही इसे हटा सकती है।
वहीं, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नया वक्फ कानून मुस्लिम समाज के संवैधानिक अधिकारों का हनन है। इसमें AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद, जमीयत उलेमा-ए-हिंद और कई सामाजिक संगठनों ने याचिकाएं दायर की थीं।

CJI की अहम टिप्पणी: धर्म सिर्फ इस्लाम तक सीमित नहीं
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने बेहद संतुलित टिप्पणी की
“धार्मिक दान केवल इस्लाम तक सीमित नहीं है, हिंदू धर्म में भी ‘मोक्ष’ और ईसाई धर्म में ‘स्वर्ग’ की अवधारणा है।”
इससे साफ है कि कोर्ट इस मुद्दे को केवल एक धर्म की नजर से नहीं, संवैधानिक ढांचे और सेक्युलर सोच के दायरे में देख रही है।
नया कानून: विरोध और समर्थन दोनों
वक्फ (संशोधन) बिल 2025, 5 अप्रैल को राष्ट्रपति की मंजूरी से कानून बन चुका है।
- लोकसभा में 288 सांसदों ने इसका समर्थन किया,
- 232 इसके खिलाफ थे।
इसमें एक विवादास्पद प्रावधान सेक्शन 3E है जो अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में वक्फ के निर्माण पर रोक लगाता है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ये अन्याय और असंवैधानिक है।
आखिर यह फैसला क्यों इतना अहम है?
यह फैसला केवल एक कानून की वैधता तय नहीं करेगा। यह तय करेगा कि क्या धार्मिक परंपराएं संसद की इच्छाओं के अधीन हैं? क्या राज्य परोपकारी धार्मिक दान को नियंत्रित कर सकता है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या धर्मनिरपेक्ष भारत में हर समुदाय को समान संरक्षण मिल रहा है?
धर्म की जमीन पर कानून के कदम संभलकर पड़ने चाहिए
भारत एक ऐसा देश है जहां धर्म सिर्फ पूजा का माध्यम नहीं, जीवन जीने की शैली है। वक्फ जैसी संस्थाएं सिर्फ धार्मिक नहीं, सामाजिक सहारे का स्रोत भी हैं खासकर गरीब और वंचित वर्गों के लिए। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल मुस्लिम समाज, बल्कि पूरे देश के धार्मिक-सामाजिक संतुलन के लिए बेहद अहम साबित होगा।
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