
लोकतंत्र की नींव पर तकरार
एक लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी मतदाता सूची (voter list) होती है। यहीं से तय होता है कि कौन बोलेगा, कौन चुनेगा, और कौन चुना जाएगा। लेकिन जब इस सूची को लेकर ही देश की सबसे बड़ी संस्थाएं—चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट—आमने-सामने खड़ी हो जाएं, तो सवाल उठना लाज़मी है।
क्या वाकई वोटर लिस्ट में बदलाव का अधिकार सिर्फ चुनाव आयोग को है? या क्या अदालत को भी ये कहने का हक है कि ‘कब और कैसे’ वोटर सूची बनाई या बदली जाए?
मामला क्या है?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई जिसमें मांग की गई कि चुनाव आयोग हर चुनाव से पहले Special Intensive Revision (SIR) करे — ताकि फर्जी, मृत या गैर-नागरिकों को वोटर लिस्ट से हटाया जा सके। जवाब में, चुनाव आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए हलफनामा दाखिल कर कहा:
SIR कराना हमारा विशेषाधिकार है। अदालत अगर इसमें निर्देश देती है, तो यह हमारे संवैधानिक अधिकारों में दखल होगा।
EC का तर्क साफ था संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत वोटर लिस्ट बनाना, सुधारना और अपडेट करना केवल हमारा काम है।
EC का पक्ष: हम जानते हैं क्या करना है
- चुनाव आयोग ने कहा कि वह देश भर में पारदर्शी और सटीक वोटर लिस्ट बनाने के लिए नियमित रूप से काम करता है।
- उन्होंने 24 जून 2025 को सभी राज्यों (बिहार को छोड़कर) के CEO को 1 जनवरी 2026 की पात्रता तिथि के अनुसार SIR शुरू करने का निर्देश दे दिया था।
- आयोग ने कहा कि वोटर लिस्ट में बदलाव का कोई तय टाइम फ्रेम नहीं होता — यह ज़रूरत के हिसाब से किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट का कहना: आधार की जांच हो
सुप्रीम कोर्ट ने 8 सितंबर को आदेश दिया कि SIR प्रक्रिया में आधार कार्ड को पहचान प्रमाण के रूप में अनिवार्य किया जाए, लेकिन ये भी स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है।
अदालत ने EC से कहा कि वह आधार नंबर की प्रामाणिकता की जांच कर सकता है, लेकिन अधिकारों की सीमा का भी ध्यान रखा जाए।
बिहार में क्यों मचा हंगामा?
बिहार में 2003 के बाद पहली बार SIR हुआ। EC के अनुसार:
- करीब 65 लाख नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए।
- कुल मतदाता संख्या 7.9 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ रह गई।
- हटाए गए नामों में मृतक, डुप्लीकेट वोटर और अवैध प्रवासियों के नाम बताए गए।
लेकिन विपक्ष ने इस पर सवाल खड़े किए:
क्या ये प्रक्रिया लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने की चाल है?
तो असली मुद्दा क्या है?
ये सिर्फ अधिकारों की लड़ाई नहीं है। यह सवाल है कि क्या वोटर लिस्ट में फेरबदल की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष है? अगर EC कहता है कि अदालत निर्देश न दे, तो यह तर्क ठीक है — लेकिन जब लाखों नाम बिना पब्लिक नोटिस या सुनवाई के हटा दिए जाएं, तब क्या आम नागरिकों का भरोसा नहीं टूटता?
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