Trump Tariff Policy: वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी आक्रामक टैरिफ रणनीति को फिर से यह कहते हुए सही ठहराया है कि यह अमेरिकी श्रमिकों और मैन्युफैक्चरिंग की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। उनके मुताबिक, “अमेरिका फर्स्ट” एजेंडा की रीढ़ यही नीति है, जो एक ओर विदेशी आयात को महंगा बनाती है और दूसरी ओर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देती है।
सत्ता में वापसी के बाद से इस नीति का सीधा असर टैरिफ कलेक्शन में दिख रहा है। फॉक्स बिजनेस के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 में अमेरिका ने $215.2 बिलियन की रिकॉर्ड ड्यूटी वसूली की। सिर्फ अक्टूबर में $34.2 बिलियन का राजस्व जुटा जो अब तक का उच्चतम मासिक आंकड़ा है।
Trump Tariff Policy: वित्त वर्ष 2026 की शुरुआत भी इसी रफ्तार से हुई है
ट्रेज़री के ताज़ा आंकड़ों में पहले ही $41.6 बिलियन का टैरिफ रेवेन्यू दर्ज है। अप्रैल में ट्रंप द्वारा घोषित लिबरेशन डे टैरिफ के बाद यह वृद्धि और तेज़ हुई मई के $23.9 बिलियन से बढ़कर जुलाई में $29 बिलियन तक पहुँच गई, जबकि अगस्त और सितंबर ने मिलकर $62.6 बिलियन जोड़े।
ट्रंप का तर्क है कि जब आयात महंगा होता है, तो कंपनियाँ उत्पादन वापस अमेरिका ले जाने पर मजबूर होती हैं, और सरकार को अतिरिक्त राजस्व भी मिलता है। लेकिन आर्थिक विश्लेषण इस दावे को सीधी रेखा में स्वीकार नहीं करता।
टैरिफ: दावा और वास्तविकता के बीच का अंतर
ट्रंप जिस आधार पर टैरिफ का बचाव करते हैं, वह यह मान्यता है कि अतिरिक्त लागत विदेशी निर्यातकों पर पड़ती है। इससे अमेरिकी उपभोक्ता और व्यवसाय प्रभाव से बाहर रहेंगे कम से कम यही उनका राजनीतिक संदेश है।
मगर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि वास्तविक दुनिया में टैरिफ उसी तरह काम नहीं करते। यह आयात पर लगाया गया टैक्स है, और जब तक विदेशी आपूर्तिकर्ता कीमतों में अप्राकृतिक स्तर तक कटौती न करें which विशेषज्ञों के अनुसार सीमित और दुर्लभ होता है ज्यादातर बोझ घरेलू अर्थव्यवस्था पर ही आता है।
अर्थशास्त्र की भाषा में इसे टैक्स इंसिडेंस कहा जाता है यानी बाज़ार संतुलन बनने के बाद वास्तव में टैक्स कौन चुकाता है।
आज की वैश्वीकृत सप्लाई चेन में, जहाँ कारों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक लगभग हर उत्पाद में आयातित पुर्ज़े शामिल हैं, इस टैक्स की कीमत अंततः उसी औद्योगिक ढाँचे पर लौट आती है जो अमेरिका की आर्थिक गतिविधियों को चलाता है।
गहरी पड़ताल की आवश्यकता
आंकड़े यह दिखाते हैं कि राजस्व में भारी वृद्धि हुई है। लेकिन आर्थिक सिद्धांत और स्वतंत्र संस्थाओं के मूल्यांकन संकेत देते हैं कि यह राजस्व किस कीमत पर आ रहा है, इसे समझना उतना ही जरूरी है। टैरिफ से बढ़ता सरकारी खजाना एक तस्वीर पेश करता है, जबकि उससे प्रभावित उत्पादन लागत, रिटेल कीमतें और सप्लाई चेन दबाव दूसरी तस्वीर बनाते हैं। इन दोनों के बीच की दूरी ही उस नीति का असली असर तय करेगी, जो फिलहाल ट्रंप प्रशासन की आर्थिक रणनीति का केंद्र बनी हुई है।
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