Tiger Rewilding JaiVeeru MadhavPark: पिछले साल रातापानी टाइगर रिजर्व में एक बाघिन की टेरिटोरियल फाइट में मौत हो गई थी। उस समय उसके दो शावक सिर्फ 6 महीने के थे। यह उम्र बेहद नाजुक होती है क्योंकि इसी समय बाघिन अपने बच्चों को शिकार करना सिखाती है। मां के बिना इनकी जिंदगी संकट में थी।
Tiger Rewilding JaiVeeru MadhavPark: कान्हा रिवाइल्डिंग सेंटर बना जीवन रेखा
लेकिन, कान्हा टाइगर रिजर्व के रिवाइल्डिंग सेंटर ने ये कमी पूरी कर दी। यहां एक साल से इनकी ट्रेनिंग चल रही है, जिससे वे खुले जंगल में आसानी से जिंदगी बिता सकें। अब ये 18 माह के हो चुके हैं। इन्हें जय-वीरू नाम दिया गया है। पूरी तरह शिकार सीखने के बाद दिसंबर तक इन्हें माधव नेशनल पार्क में छोड़ दिया जाएगा। इनके साथ सिवनी वन मंडल से पहुंचा एक शावक और है। उसे भी कुछ दिन बाद ही जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
अकेले नहीं होंगे जंगल में, साथ होगा एक और शावक
यह देश का एकमात्र रिवाइल्डिंग सेंटर है, जहां अनाथ बाघ शावकों को ट्रेनिंग देकर खुले जंगल में छोड़ा जाता है। शुरुआत 2005 में हुई थी। तब तीन बाघ शावकों की मां की मौत हो गई थी। इन्हें पहले दूध पिलाकर जिंदा रखा गया। फिर बाड़े में रखकर ट्रेनिंग दी गई। तीन साल में ये जंगल में रहने लायक बन गए। दो मादा शावकों को पन्ना और एक नर को भोपाल वन विहार में छोड़ा गया। अब तक 14 शावकों को जंगल में जीने लायक बनाया जा चुका है। अब अन्य राज्यों में भी ऐसे सेंटर शुरू किए जा रहे हैं।
Tiger Rewilding JaiVeeru MadhavPark: देश का पहला और इकलौता रिवाइल्डिंग सेंटर
पूरा प्रशिक्षण डॉ. संदीप अग्रवाल की निगरानी में होता है। खास ध्यान रखा जाता है कि शावक इंसानों पर निर्भर न हो जाएं।बाड़े में जंगल जैसा माहौल दिया जाता है। उम्र के हिसाब से शिकार के लिए मुर्गा, बकरा खरगोश आदि छोटे प्राणी छोड़े जाते हैं। भूख लगने पर वे शिकार करते हैं।धीरे-धीरे वे बड़े जानवरों का शिकार करने लगते है। फिर बड़े बाड़े में छोड़ देते हैं, जहां चीतल, नीलगाय आदि होते हैं।हमारे यहां अनाथ बाघ शावकों को ट्रेनिंग दी जा रही है। इससे बिन मां के शावकों को चिड़ियाघर नहीं, बल्कि ट्रेनिंग के बाद खुला जंगल मिलता है। जिसमें वे पुनवर्वासित होकर अपना कुनबा बढ़ाते हैं। -रवींद्र मणि त्रिपाठी, फील्ड डायरेक्टर कान्हा टाइगर रिजर्व
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