जब दिल्ली की सड़कों पर डर चलता है
समस्या बड़ी है, लेकिन क्या हम इसे सही दिशा में सुलझा रहे हैं?
दिल्ली की सड़कों पर सुबह की दौड़ लगाते लोग हों या रात की अंतिम मेट्रो से लौटते मजदूर – एक डर सबके मन में बैठा है: कहीं अचानक कोई आवारा कुत्ता झपट न ले। यह कोई नई बात नहीं। सालों से ये बहस चल रही है – आवारा कुत्तों के हमले, उनकी बढ़ती आबादी और मानव जीवन पर खतरे।
इसी बीच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने ओडिशा के कटक में एक सभा में ऐसा बयान दिया जिसने इस बहस को फिर एक नया मोड़ दे दिया। उन्होंने कहा
“शेल्टर होम में भेजना हल नहीं है। आबादी नियंत्रित करनी होगी।
मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन जरूरी है।”
ये बयान यूं ही नहीं आया। पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला था, जिसमें दिल्ली-NCR से आवारा कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में भेजने का आदेश दिया गया था। मगर भागवत के शब्दों में एक बड़ी बात छिपी है समस्या को दबाना नहीं, समझना ज़रूरी है।
क्या वाकई सिर्फ शेल्टर ही हल है?
मान लीजिए एक मोहल्ले में 50 कुत्ते हैं। उन्हें पकड़कर एक बड़ी इमारत में बंद कर दिया जाए। तो क्या आपकी समस्या खत्म हो गई? नहीं।
कुत्ते इंसानों जैसे नहीं सोचते, लेकिन वो भी महसूस करते हैं। भूख, डर, चोट और बेवजह कैद – उन्हें भी तकलीफ देती है। और फिर हकीकत ये है कि दिल्ली में हर साल हजारों कुत्ते बढ़ जाते हैं। उन्हें शेल्टर में रखना न सिर्फ लॉजिस्टिक चुनौती है, बल्कि मानवता के खिलाफ भी है।
भागवत का इशारा: भारतीय तरीका, संतुलन वाला समाधान
मोहन भागवत का ज़ोर इस बात पर था कि समाधान केवल सरकारी फरमान से नहीं आते, बल्कि परंपरा, प्रकृति और समाज की सामूहिक समझ से आते हैं।
उन्होंने भारत की मिट्टी और किसानों की तुलना यूरोप-अफ्रीका से की। कहा कि हम ज़मीन का दोहन नहीं करते, बस ज़रूरत भर लेते हैं।
यही सोच कुत्तों पर भी लागू हो सकती है उन्हें खत्म नहीं करना, उनकी संख्या और व्यवहार को समझदारी से मैनेज करना है।
समस्या के तीन पहलू: कौन क्या कह रहा है?
सुप्रीम कोर्ट – दिल्ली में कुत्तों के हमले चिंताजनक हैं। जनता की सुरक्षा पहले। कुत्तों को शेल्टर में भेजने का आदेश।
पशु संगठन – ये आदेश पशु अधिकारों का उल्लंघन है। कुत्ते भी इस धरती पर उतने ही हक़दार हैं जितने इंसान।
भागवत जी – संख्या नियंत्रित करें, जबरदस्ती हटाना समाधान नहीं। पारंपरिक तरीकों और संतुलन से हल निकलेगा।
समाधान क्या हो सकता है? भागवत के सुझाव से आगे बढ़ते हुए
TNVR (Trap-Neuter-Vaccinate-Release) का बड़े स्तर पर विस्तार – ये एक वैज्ञानिक और मानवीय तरीका है। कुत्तों को पकड़ो, नसबंदी कराओ, वैक्सीन दो और फिर वहीं छोड़ दो। इससे उनकी संख्या धीरे-धीरे घटती है।
स्थानीय लोगों को शामिल करें – हर मोहल्ले में कुछ लोग होते हैं जो कुत्तों को खाना देते हैं, देखभाल करते हैं। उन्हें प्रशिक्षित किया जा सकता है ताकि वो कुत्तों के व्यवहार को समझें और लोगों को भी समझाएं।
स्कूलों और समाज में शिक्षा – बच्चों को सिखाएं कि जानवरों से कैसे व्यवहार करें। डर और नफरत से नहीं, समझदारी से।
हेल्पलाइन और मोबाइल टीमें – जो घायल या आक्रामक कुत्तों को तुरंत मेडिकल सहायता दे सकें।
डर को दया से और समस्या को समझदारी से देखें
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिन सड़कों पर हम चलते हैं, उन्हीं पर ये जानवर भी जीने की कोशिश कर रहे हैं। समस्या है, लेकिन उसका हल नफरत नहीं, समझ है। मोहन भागवत का बयान सिर्फ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सोच है – जो कहती है कि प्रकृति से लड़ो नहीं, साथ चलो।
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