जब दुनिया अस्थिरता और टकराव के दौर से गुजर रही है, ऐसे समय में भारत अपनी लोकतांत्रिक जड़ों और संवैधानिक मूल्यों के सहारे आगे बढ़ रहा है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यही भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि भारत न केवल लोकतंत्र की जन्मभूमि है, बल्कि आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में भी मजबूती से कदम बढ़ा रहा है।
26 जनवरी 1950, जब भारत ने खुद को परिभाषित किया
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि 26 जनवरी 1950 का दिन भारत के इतिहास में निर्णायक मोड़ था। उसी दिन संविधान पूरी तरह लागू हुआ और देश ने औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में खुद को स्थापित किया. उन्होंने कहा कि हमारा संविधान विश्व इतिहास के सबसे बड़े गणराज्य का आधारभूत दस्तावेज है, जो न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व जैसे मूल्यों पर टिका है।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ से बदली तस्वीर
राष्ट्रपति ने कहा कि बीते वर्षों में बेटियों की शिक्षा को लेकर ठोस बदलाव देखने को मिले हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान ने सामाजिक सोच को प्रभावित किया है. उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत अब तक 57 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए हैं, जिनमें करीब 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं। यह आर्थिक सशक्तिकरण का साफ संकेत है।
मतदान में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी
डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि बाबासाहब मानते थे कि मताधिकार का प्रयोग ही राजनीतिक शिक्षा का माध्यम है। आज भारत के मतदाता, खासकर महिलाएं, इस सोच को जमीन पर उतार रही हैं। चुनावों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी हमारे गणतंत्र की सबसे मजबूत तस्वीर है।
किसान, डॉक्टर और उद्यमी, देश की असली ताकत
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि देश के अन्नदाता किसान करोड़ों लोगों के लिए पोषण का आधार हैं। वहीं डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी सेवा भावना के साथ समाज को स्वस्थ रखने में जुटे हैं.उन्होंने यह भी कहा कि देश की महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, खेल और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में नए मानक स्थापित कर रही हैं।
कलाकार और शिल्पकार परंपरा को दे रहे नई पहचान
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कलाकारों, शिल्पकारों और साहित्यकारों की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ये लोग भारत की समृद्ध परंपराओं को आधुनिक अभिव्यक्ति दे रहे हैं। साथ ही ऊर्जावान उद्यमी आत्मनिर्भर भारत की नींव को और मजबूत कर रहे हैं, जिससे देश वैश्विक मंच पर नई पहचान बना रहा है।
‘वंदे मातरम्’ और राष्ट्रभक्ति की विरासत
राष्ट्रपति ने ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि महान राष्ट्रवादी कवि सुब्रमण्यम भारती ने तमिल भाषा में ‘वंदे मातरम्’ पर आधारित गीत की रचना की, जिससे यह भावना जन-जन तक पहुंची। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ आज हमारी राष्ट्रीय प्रार्थना है, जबकि श्री अरबिंदो ने इसे अंग्रेजी में अनुवादित कर वैश्विक पहचान दिलाई।
नेताजी की जयंती और युवाओं के लिए संदेश
राष्ट्रपति ने याद दिलाया कि 23 जनवरी को देश ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाई। वर्ष 2021 से इसे ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है, ताकि युवा पीढ़ी नेताजी की अदम्य देशभक्ति और साहस से प्रेरणा ले सके। संविधान ही भारत की सबसे बड़ी ताकत अपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि देश की आत्मा है। यही संविधान भारत को एकजुट रखता है और आने वाले समय में भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में आगे बढ़ने की राह दिखाता है।
