Naxal Surrender Controversy : छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण ने सियासी तूफान को जन्म दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने इस मामले में सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया है कि नक्सलियों और सरकार के बीच कोई गुप्त डील हुई है। उन्होंने पूछा कि क्या झीरम-2 जैसी कोई प्लानिंग चल रही है, और क्यों मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री सरेंडर स्थल पर मौजूद रहने के बावजूद वहां नहीं गए। बैज ने कहा कि यह सिर्फ दिखावा या औपचारिकता हो सकती है, साथ ही बड़े नक्सली चेहरे रूपेश उर्फ अभय को मीडिया के सामने क्यों नहीं लाया गया।
साव का पलटवार और कांग्रेस पर आरोप
इस आरोप पर छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने पलटवार किया और बैज की बातों को नक्सलवाद की गंभीरता को न समझने वाली टिप्पणी करार दिया। साव ने कहा कि देश में नक्सलवाद को 2026 तक खत्म करने का लक्ष्य प्रधानमंत्री मोदी ने रखा है और कांग्रेस ही नक्सलवाद को पालने-पोसने वाली पार्टी रही है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में नक्सलियों को संरक्षण मिलता रहा।
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नक्सल सरेंडर अभियान का हाल
सरकार ने नक्सल आतंकवाद को खत्म करने के लिए कड़ा अभियान चलाया है जिसमें अब तक हजारों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया है। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और अन्य प्रभावित राज्यों में सुरक्षा और पुनर्वास कार्यक्रम जारी हैं। आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक सहायता और प्रशिक्षण देने का प्रावधान भी है। इससे नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति कायम करने में मदद मिली है।
राजनीतिक तनाव
इस मामले ने छत्तीसगढ़ की सियासत में नया विवाद खड़ा कर दिया है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। नक्सल सरेंडर को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तीखी जंग चल रही है। आने वाले समय में इस विवाद की राजनीति पर असर पड़ सकता है, खासकर झीरम जैसी घटनाओं को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।
यह स्थिति दर्शाती है कि नक्सलवाद के खात्मे की प्रक्रिया में न सिर्फ सुरक्षा बल काम कर रहे हैं, बल्कि राजनीतिक समीकरण भी गहरे प्रभावित हो रहे हैं, जिससे सियासी महौल गरमाया हुआ है।
