ग्वालियर से करीब 15 किलोमीटर दूर गिरगांव गांव में स्थित है एक अनोखा मंदिर, जहां भगवान शिव को ‘मजिस्ट्रेट महादेव‘ के नाम से जाना जाता है। यहां केवल पूजा-अर्चना ही नहीं होती, बल्कि बाकायदा कोर्ट की तरह केस दर्ज किए जाते हैं, पंच सुनवाई करते हैं, और अंत में महादेव के नाम पर निर्णय सुनाया जाता है। यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र तो है ही, साथ ही यह लोगों की आखिरी उम्मीद भी बन गया है जब उन्हें किसी पारंपरिक कोर्ट से न्याय नहीं मिलता।
कैसे होता है यहां न्याय?
गिरगांव में मौजूद ‘मजिस्ट्रेट महादेव’ की अदालत किसी लोक अदालत से कम नहीं लगती। जब कोई व्यक्ति किसी विवाद या अपराध को लेकर यहां आता है, तो सबसे पहले पंचों को बुलाया जाता है। आमतौर पर 11 पंचों का एक पैनल होता है, जिसमें से कम से कम 5 पंच मौजूद रहकर केस की सुनवाई करते हैं। दोनों पक्ष सबूत, गवाहों और अपने-अपने बयान के साथ उपस्थित होते हैं। फिर महादेव की पिंडी के सामने खड़े होकर ‘धर्म’ यानी कसम दिलाई जाती है कि जो भी कहा जा रहा है, वो सत्य है। यह प्रक्रिया इतनी प्रभावशाली है कि अधिकतर लोग सत्य स्वीकार कर लेते हैं।
मुंबई से आए भाइयों का आधा किलो सोने का विवाद ऐसे सुलझा
साल 2024 में महाराष्ट्र के मुंबई से दो भाई गिरगांव पहुंचे। दोनों के बीच आधा किलो सोने के बंटवारे को लेकर लंबा विवाद चला आ रहा था। जब इस मामले की सुनवाई महादेव की अदालत में हुई, तो दोनों भाइयों को भगवान शिव के सामने शपथ दिलाई गई कि वे सच बोलें। महादेव के दरबार में शपथ लेने के बाद कुछ ही दिनों में बड़े भाई को लगभग 2 लाख रुपए का नुकसान हो गया। इस अनुभव के बाद उसने स्वीकार किया कि गलती उसकी थी, और उसने छोटे भाई को उसका हक लौटा दिया। यह मामला क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया।
मुस्लिम समाज भी करता है आस्था के साथ न्याय की गुहार
मजिस्ट्रेट महादेव की अदालत में केवल हिंदू ही नहीं, मुस्लिम समुदाय के लोग भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। 12 जुलाई 2025 को पारोली गांव के सलीम शाह नामक व्यक्ति ने मंदिर में केस दर्ज कराया कि उसके घर से अनाज और बर्तन चोरी हो गए हैं। पंचों ने शपथ और ‘धर्म’ के आधार पर पांच दिनों की समय सीमा तय की। तय समय के भीतर ही संदेहास्पद व्यक्ति को आर्थिक नुकसान हुआ, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वही दोषी था। ऐसे मामलों से मंदिर की लोकप्रियता और विश्वास में लगातार इज़ाफा हो रहा है।
एक श्रद्धालु ने दी 1 करोड़ की जमीन दान में, क्यों?
महादेव की अदालत और मंदिर के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हाल ही में एक श्रद्धालु ने 3 बीघा जमीन, जिसकी कीमत करीब 1 करोड़ रुपए है, मंदिर को दान में दे दी। यह जमीन मंदिर की व्यवस्थाओं और सामाजिक कार्यों में काम आएगी। इस मंदिर में सामाजिक न्याय, अध्यात्म और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो देशभर से श्रद्धालुओं को यहां खींच लाता है।
इतिहास और मान्यता
गिरगांव का यह मंदिर हजारों साल पुराना माना जाता है। यहां भगवान शिव की प्राचीन पिंडी के साथ-साथ पूरा शिव परिवार स्थापित है। मंदिर की सीढ़ियों पर लिखा है — “मजिस्ट्रेट महादेव”। मान्यता है कि जो भी इस अदालत में झूठ बोलता है या फैसला मानने से इनकार करता है, उसे कुछ ही दिनों में ‘ईश्वरीय दंड’ मिलता है। यही कारण है कि यहां आने वाला हर व्यक्ति सच बोलने के लिए विवश हो जाता है।
धर्म और आस्था का मिलन
गिरगांव का ‘मजिस्ट्रेट महादेव’ मंदिर ना केवल आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा है, बल्कि यह सामाजिक न्याय का एक प्रतीक भी बन चुका है। यहां जो फैसले होते हैं, वे केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक असर भी रखते हैं। यही वजह है कि लोग देश के कोने-कोने से यहां ‘फैसला’ करवाने आते हैं। सावन में यहां भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है, और महादेव की अदालत एक बार फिर सज जाती है, इंसाफ के इंतज़ार में।
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