Karila Dham: अशोकनगर जिले में स्थित प्रसिद्ध मां जानकी धाम करीला में रंग पंचमी के अवसर पर लगने वाला ऐतिहासिक करीला मेला शुरू हो गया है। आज सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ मंदिर परिसर में उमड़ रही है। प्रशासन के मुताबिक अगले 24 घंटों में लाखों श्रद्धालु माता जानकी के दर्शन के लिए करीला धाम पहुंचेंगे। बता दें की मेले का शुभारंभ पारंपरिक रूप से झंडा चढ़ाने की रस्म के साथ किया गया।

रंग पंचमी के इस अवसर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी करीला धाम पहुंचेंगे। वे माता जानकी के दर्शन कर मेला परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल होंगे और सभा को संबोधित करेंगे। साथ ही क्षेत्र में कई विकास कार्यों की सौगात देते हुए दिखाई देंगे।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के चलते विशेष व्यवस्था
इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने विशेष व्यवस्थाएं की हैं। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा और व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी महिला अधिकारियों और कर्मचारियों को सौंपी गई है, जिससे प्रशासनिक कार्यों में महिलाओं की भूमिका और क्षमता को प्रमुखता से प्रदर्शित किया जा सके।
Karila Dham: पौराणिक मान्यता से जुड़ा है करीला धाम
बता दें की करीला धाम को लेकर धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि जब भगवान राम ने माता सीता को वनवास भेजा था, तब वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में आकर ठहरी थीं। और इससे माना जाता है कि यही वह स्थान है जहां माता सीता ने अपने पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया था।
साथ ही ये भी माना जाता है की लव-कुश के जन्म के समय स्वर्ग से अप्सराएं यहां उतरी थीं और उन्होंने खुशी में नृत्य किया था। इसी मान्यता के चलते यहां रंग पंचमी की रात को नृत्यांगनाओं द्वारा बधाई नृत्य करने की परंपरा चली आ रही है। आज भी सैकड़ों नृत्यांगनाएं पूरी रात राई नृत्य करती हैं। जहा हजारों की संख्या में लोग शामिल होते है। और एक दूसरे को गुलाल लगाते है।

200 साल पुराना है करीला धाम
कहा जाता है की यह करीला धाम लगभग 200 साल पुराना है। और महंत तपसी महाराज को स्वप्न में संकेत मिला था कि करीला गांव की पहाड़ी पर स्थित वाल्मीकि आश्रम में माता जानकी और लव-कुश कुछ समय तक रहे थे।
Karila Dham: स्वप्न के बाद तपसी महाराज ने इस स्थान की खोज की और उन्हें वही आश्रम मिला जैसा उन्होंने स्वप्न में देखा था। इसके बाद उन्होंने वहां रहकर पूजा-अर्चना शुरू की और आसपास के ग्रामीणों के सहयोग से यह स्थान धीरे-धीरे एक प्रमुख धार्मिक केंद्र बन गया।
