कल्पना कीजिए एक स्कूल का गेट, जंग लगा हुआ ताला और अंदर उगे हुए घास के ढेर। क्लासरूम के ब्लैकबोर्ड पर आखिरी बार कोई क्या लिख गया था ये भी अब धुंधला हो चुका है। और फिर दूसरी तस्वीर एक क्लासरूम जहां एक अकेला टीचर है, और स्कूल की घंटी तो बजती है, लेकिन छात्र गिने-चुने हैं।

देश में पहली बार शिक्षकों की संख्या 1 करोड़ के पार पहुंची है। लेकिन उसी देश में 8 हजार स्कूल ऐसे हैं जहां कोई बच्चा पढ़ने ही नहीं आता। 1 लाख से ज्यादा स्कूलों में तो बस एक अकेला टीचर ही काम चला रहा है। क्या यही है वो “शिक्षित भारत” जिसकी हम बात करते हैं?
वास्तविकता: संख्या के पीछे छुपा दर्द
यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE+) की ताज़ा रिपोर्ट ने जो तस्वीर पेश की है, वो हमारे भविष्य पर सवाल उठाती है। 1,04,125 स्कूलों में सिर्फ एक टीचर, यानी वही पढ़ाए, वही एडमिन का काम देखे, वही रिपोर्ट बनाए, और वही कभी-कभी स्कूल की सफाई भी कर दे। 8,000 से ज्यादा स्कूलों में कोई छात्र ही नहीं है। सोचिए, एक इमारत खड़ी है, झंडा भी है, लेकिन राष्ट्रगान गाने वाला कोई नहीं।
महिला शिक्षकों की संख्या बढ़ी, पर असमानता अभी बाकी
पिछले दशक में महिला शिक्षकों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है अब वे 54 लाख से ज्यादा हैं। यह निश्चित ही एक सकारात्मक बदलाव है। लेकिन अगर झारखंड जैसे राज्यों में एक टीचर को औसतन 47 बच्चों को पढ़ाना पड़ता है, जबकि सिक्किम में यह संख्या सिर्फ 7 है तो क्या यह समान अवसर की तस्वीर है?
आशा की किरणें भी हैं, मगर संघर्ष लंबा है
कुछ आँकड़े दिल को राहत भी देते हैं। जैसे कि ड्रॉपआउट रेट में गिरावट आई है रिटेंशन रेट में बढ़ोतरी हुई है और प्यूपिल-टीचर रेश्यो भी सुधर कर अब 21:1 हो गया है लेकिन असली सवाल ये है क्या ये आंकड़े ज़मीन पर भी महसूस हो रहे हैं? क्या एक गरीब ग्रामीण छात्र, जो रोज़ 3 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल आता है, उसे वही गुणवत्ता मिलती है जो शहर के किसी प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले को मिलती है?
शहरी-ग्रामीण: ट्यूशन पर निर्भरता
एक और चौंकाने वाला डेटा सामने आया है हर 4 में से 1 बच्चा ट्यूशन ले रहा है। शहरों में 30.7% बच्चे, जबकि गांवों में 25.5% बच्चे ट्यूशन पर निर्भर हैं। यानी जो शिक्षा स्कूल में मिलनी चाहिए, वो अब प्राइवेट कोचिंग सेंटर्स दे रहे हैं पैसे लेकर। क्या ये हमारे सरकारी स्कूलों पर अविश्वास का संकेत नहीं?

समय है सिर्फ आंकड़े गिनने का नहीं, ज़मीन पर काम करने का
1 करोड़ शिक्षक होना गर्व की बात हो सकती है, लेकिन जब 8 हजार स्कूलों में एक भी बच्चा नहीं है, तो यह गर्व कड़वाहट में बदल जाता है।शिक्षा का असली मकसद एक भवन या आंकड़ा नहीं है। शिक्षा वो शक्ति है जो एक किसान के बेटे को डॉक्टर बना सकती है, एक मज़दूर की बेटी को अफसर। आज जरूरत है नीतियों से ज़्यादा नीतियों के लागू होने की। आंकड़ों से ज़्यादा उनके पीछे छिपी हकीकत को समझने की।
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