Hindus in Bangladesh violence: जो देश कभी भारत का ही हिस्सा था. वही आज उसके सबसे पुराने समुदाय के लिए डर की ज़मीन बनता जा रहा है, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे हमले अब किसी एक घटना तक सीमित नहीं रहे, वहाँ न पुरुष सुरक्षित हैं न महिलाएँ न ही वह साधारण हिन्दू दुकानदार. जिसकी सबसे बड़ी गलती” सिर्फ उसकी पहचान है ।
सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि बांग्लादेश में हिन्दू मारे जा रहे हैं. सबसे डरावनी बात यह है कि भारत मेंजहाँ मानवाधिकारों पर बहस करने वाला एक पूरा वर्ग मौजूद है इस मुद्दे पर अजीब-सी ख़ामोशी पसरी हुई है ।
बांग्लादेश जल रहा है. विमर्श कहीं और भटक गया है
बांग्लादेश आज सचमुच जल रहा है, हिन्दू घर जल रहे हैं. दुकानें उजड़ रही हैं. लोग मारे जा रहे हैं, लेकिन भारत में बहस चल रही हैवेनेजुएला के राष्ट्रपति और उसके परिवार के मानवाधिकारों पर ।
यह सवाल उठना स्वाभाविक हैक्या पड़ोस में मरते लोग. जिनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ें भारत से जुड़ी हैं. हमारे विमर्श में जगह नहीं रखते?
15 दिनों में 7 हत्याएं और सिलसिला थमता नहीं
दीपू चंद्र की हत्या के साथ जो दौर शुरू हुआ. वह थमने का नाम नहीं ले रहा । उसकी हत्या सबने देखी उस पर शोर भी हुआ. लेकिन उसके बाद जो हुआवह कहीं ज़्यादा भयावह है ।
ऐसा लगता है….
मानो बांग्लादेश में सत्ता की राजनीति अब हिन्दुओं के ख़ून के इर्द-गिर्द घूमने लगी है. कभी बेअदबी के नाम पर हत्या होती है कभी किसी हिन्दू दुकानदार को यूँ ही मार दिया जाता है । दिसंबर 2025 से लेकर अब तक. लगभग 35 दिनों में कम से कम 11 हिन्दुओं की हत्या हो चुकी है । और इन हत्याओं में एक समानता साफ़ दिखती हैइनकी वजह सिर्फ और सिर्फ धर्म है ।
शरद चक्रवर्ती और राणा प्रताप बैरागी की हत्या
सबसे ताज़ा घटना पलाश उपजिला के चारसिंदूर बाज़ार की है. जहाँ किराना दुकानदार शरद चक्रवर्ती पर रात करीब 11 बजे हमला कर उनकी हत्या कर दी गई. इसी दिन कुछ घंटे पहले, जेस्सोर ज़िले में 38 वर्षीय राणा प्रताप बैरागी को सिर में गोली मार दी गई । वे सिर्फ एक कारोबारी ही नहीं. बल्कि एक समाचार पत्र के कार्यवाहक संपादक भी थे ।
ये महज़ आपराधिक घटनाएँ नहीं थीं, ये संकेत थेडर फैलाने के चुप कराने के ।
मौत की घाटी” एक फेसबुक पोस्ट और एक सच्चाई
शरद चक्रवर्ती ने अपनी हत्या से पहले फेसबुक पर एक पोस्ट लिखी थी । उसमें उन्होंने बढ़ती हिंसा पर चिंता जताते हुए अपनी जन्मभूमि को मौत की घाटी” कहा था ।
उनकी कही बात जैसे सच साबित करने का बीड़ा हमलावरों ने उठा लिया ।
एक चश्मदीद और रिश्तेदार प्रदीप चंद्र बर्मन के अनुसार….
पहले से दुश्मनी थी… हमलावरों ने उनका मोबाइल या मोटरसाइकिल तक नहीं ली मतलब साफ़ है लूट नहीं संदेश देना था । और भारत में बहस ग़ाज़ा और वेनेजुएला पर
यह सब कुछ लगातार हो रहा है.
लेकिन…..
भारत का एक बड़ा बौद्धिक वर्ग ग़ाज़ा और वेनेजुएला पर ही अटका हुआ है, अमेरिका क्या कर रहा है. कहाँ ग़लत हैइस पर घंटे-घंटे बहस हो रही है हो सकता है अमेरिका ग़लत हो । लेकिन वेनेजुएला भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर है, वहाँ भारतीय समाज का कोई अस्तित्व नहीं है ।जबकि बांग्लादेश भारत की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है । वहाँ वही हिन्दू मारे जा रहे हैं. जिनके पुरखे इसी धरती से गए थे. जिनके देव-स्थल. परंपराएँ और स्मृतियाँ आज भी साझा हैं ।
यह चुप्पी सबसे बड़ा सवाल है
विडंबना यह है कि जिन लोगों की ज़मीन पर उनके पूर्वजों ने सदियाँ गुज़ारीं. उसी ज़मीन पर उनके ख़ून की कीमत आज भी विमर्श से बाहर है ।
बांग्लादेश में हिन्दू मर रहे हैंऔर भारत में उनकी पीड़ा पर नहीं. बल्कि दूर बैठे देशों की राजनीति पर चर्चा हो रही है ।
यह सिर्फ़ चुप्पी नहीं है यह एक असहज. डरावनी और बहुत बोलती हुई चुप्पी है ।
