
जब राष्ट्रपति खुद उलझन में हों, जनता क्या करे?
कल्पना कीजिए आपका देश हर दिन एक नई नीति अपनाए और अगले दिन उससे मुकर जाए। अमेरिका, जिसे दुनिया स्थिर नेतृत्व की मिसाल मानता था, वहाँ 194 दिन में 34 फैसलों का यू-टर्न, सिर्फ नीतियों की अस्थिरता नहीं, बल्कि सिस्टम की बेचैनी का संकेत है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शुरुआती कार्यकाल को देखें तो ये एक पलटी हुई किताब जैसी लगती है हर पन्ने पर नई घोषणा और फिर खुद ही उसे फाड़ देना।
28 बार टैरिफ पर यू-टर्न: व्यापार जगत का भरोसा टूटा
टैरिफ नीति की बात करें तो ट्रम्प शायद इतिहास में पहले ऐसे राष्ट्रपति होंगे जिन्होंने 28 बार खुद अपने फैसले वापस लिए। कनाडा और चीन जैसे साझेदारों पर टैरिफ लगाने का ऐलान कर बाज़ार में उथल-पुथल मचाई, फिर उद्योगों के दबाव में, कुछ ही दिन में फैसला वापस। फार्मास्युटिकल्स और कॉपर पर दी गई राहतों को लेकर भी बार-बार घोषणाएं और रद्द किया।
“ट्रम्प का हर नया फैसला जैसे शेयर बाज़ार के लिए सिरदर्द बनता जा रहा था,” एक अमेरिकी उद्योगपति
अदालतों की सख्ती: अब यू-टर्न पर लगने लगे ब्रेक
ट्रम्प के आदेशों के खिलाफ अमेरिका की संघीय अदालतों में 200 से ज्यादा याचिकाएं दायर हुईं। इनमें से अधिकांश पर स्टे लग चुका है। इनमें बर्थ राइट सिटिजनशिप खत्म करने की कोशिश को अदालत ने असंवैधानिक बताया। LGBTQ अधिकारों से जुड़े कुछ आदेशों पर ट्रम्प के नियुक्त जजों ने ही रोक लगाई। इक्विटी और पर्यावरण से जुड़े कई फैसले कोर्ट की नज़र में जल्दबाजी भरे और अस्थिर साबित हुए।

गाजा, यूक्रेन और डिपोर्टेशन: शब्दों की कोई कीमत नहीं?
ट्रम्प की विदेश नीति भी घोषणा और खंडन का अखाड़ा बन गई।
कुछ उदाहरण देखें:
- यूक्रेन सहायता: 9 जुलाई को रोकने का आदेश, और फिर 10 मिसाइलें भेज दीं
- गाजा युद्ध: “24 घंटे में बंद कराऊंगा” कहकर 6 महीने तक चुप रहे, फिर बयान से पलटे
- डिपोर्टेशन: अवैध प्रवासियों को निकालने की बात कोर्ट के डर से वापस ली, फिर दोबारा आदेश दिया
“एक राष्ट्रपति जो खुद तय नहीं कर पा रहा कि कल क्या सोचा था, उस पर राष्ट्र कैसे भरोसा करे?” अमेरिकी विश्लेषक, MSNBC
यू-टर्न क्यों? नेतृत्व की कमी या PR का खेल?
ट्रम्प का ये लगातार पलटना कई लोगों के लिए अनिर्णय का संकेत है, तो कुछ इसे सोची-समझी रणनीति बताते हैं जहाँ वो पहले विवाद खड़ा करते हैं, मीडिया का ध्यान खींचते हैं, फिर पलटकर “जनता की सुन ली” का ढोंग करते हैं।
लेकिन इसके परिणाम गंभीर हैं नीतिगत अस्थिरता, निवेशकों और व्यापारिक साझेदारों में अविश्वास, अदालतों की कार्यवाही में बाधा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि कमजोर होना।

अमेरिका का भरोसा किस पर टिका है?
डोनाल्ड ट्रम्प ने वादा किया था मेक अमेरिका ग्रेट अगेन! लेकिन 194 दिन में ही उन्होंने दिखा दिया कि महान बनने के लिए सिर्फ नारे नहीं, भरोसा चाहिए। और जब हर फैसला पलटा जाए, हर शब्द बदला जाए, और हर नीति एक PR स्टंट बन जाए तब जनता सिर्फ एक सवाल पूछती है:
“क्या हमारे राष्ट्रपति को खुद नहीं पता कि वो कर क्या रहे हैं?”
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