digital drug addiction bhopal teenagers trend: अब तक आप ड्रग्स को केवल पदार्थ के रूप में जानते होंगे, लेकिन भोपाल में सामने आए नए मामलों ने लोगों की सोच को झकझोर दिया है। राजधानी के गांधी मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग में हाल ही में ऐसे तीन मामले आए हैं, जिनमें 15 से 25 साल के किशोर और युवा डिजिटल ड्रग्स के शिकार पाए गए हैं।
ये युवा दिनभर हेडफोन लगाकर यूट्यूब और अन्य एप्स पर ‘डिजिटल कोकेन’, ‘डिजिटल कैनाबिस’, और ट्रांस बीट्स सुनते हैं। यह धुनें बिना शब्दों की होती हैं लेकिन इतनी शक्तिशाली होती हैं कि सुनने वाला व्यक्ति trance में चला जाता है — जैसे किसी नशे की हालत में।
जाने क्या होती है डिजिटल ड्रग?
डिजिटल ड्रग्स को बायन्यूरल बीट्स या ट्रांस म्यूजिक भी कहा जाता है। ये विशेष तरह की फ्रीक्वेंसी पर आधारित ध्वनि तरंगें होती हैं, जिन्हें सुनते वक्त मस्तिष्क में कुछ वैसी ही प्रतिक्रिया होती है जैसी किसी वास्तविक ड्रग्स के सेवन से होती है।यूजर्स इसे ‘साइबर हाई’ या ‘माइंड अल्टरिंग एक्सपीरियंस’ के रूप में महसूस करते हैं। यह पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से प्रतिबंधित नहीं है, इसलिए इसका खतरा और भी बड़ा है।
गांधी मेडिकल कॉलेज में 3 केस
गांधी मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. जेपी अग्रवाल के अनुसार,“बीते 15 दिनों में ऐसे तीन किशोर आए हैं जो दिनभर ट्रांस म्यूजिक सुनते रहते थे। वे न अपने माता-पिता से बात कर रहे थे, न पढ़ाई में मन लग रहा था। एक केस में बच्चा स्कूल जाना ही बंद कर चुका था।”
कैसे होता है असर?
शुरुआत में यह म्यूजिक “मन को शांत करने” के नाम पर सुना जाता है।धीरे-धीरे इसकी लत लग जाती है और सुनने की अवधि 8–10 घंटे हो जाती है।व्यक्ति अकेलापन चाहता है, बात करने से कतराता है और हेडफोन से जुड़ा रहता है।इसका असर नींद, भूख, ध्यान और व्यवहार पर पड़ता है।
कैसे बचा जा सकता है डिजिटल ड्रग से?
60-60 नियम अपनाएं:
60% से ज्यादा वॉल्यूम न रखें।
लगातार 60 मिनट से ज्यादा न सुनें।
म्यूजिक की गति नियंत्रित रखें:
130–160 BPM तक के म्यूजिक तक ही सीमित रहें।
माता-पिता रखें इन बातों का ध्यान
बच्चों को समझाएं कि हेडफोन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है।खुद भी बच्चों के सामने लंबे समय तक हेडफोन/ईयरफोन न लगाएं।म्यूजिक सुनने के लिए स्पीकर का उपयोग करें।बच्चों की डिजिटल एक्टिविटी पर नज़र रखें, लेकिन टॉक्सिक निगरानी न करें। संवाद बनाए रखें।
पुलिस और साइबर टीम क्या कर सकती है?
चूंकि डिजिटल ड्रग कानूनी रूप से बैन नहीं है, इसलिए न पुलिस और न साइबर टीम इसे ट्रैक कर सकती है। यह एक साइकोलॉजिकल और पैरेंटल अवेयरनेस का मामला है, न कि आपराधिक।
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