कलेक्टर ने कराए कैमरे बंद
देवास में रेलवे के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए बड़े पैमाने पर किसानों की जमीनें अधिग्रहित की गई हैं। इस प्रक्रिया में कई किसानों ने उचित मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार के अवसरों की मांग की है। अपनी मांगों को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए किसानों ने इस बैठक में हिस्सा लिया था। कलेक्टर ने स्वयं इस सार्वजनिक मंच पर किसानों से संवाद करने का वादा किया था। लेकिन जैसे ही पत्रकारों ने इस चर्चा को रिकॉर्ड करने के लिए कैमरे शुरू किए, कलेक्टर ने तुरंत उन्हें बंद करने का आदेश दे दिया। इस घटना ने उपस्थित लोगों में आश्चर्य और नाराजगी पैदा की।
Dewas Collector Controversy: प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल
पत्रकारों को कैमरे बंद करने का निर्देश देना प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना जा रहा है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, जो जनता और प्रशासन के बीच पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। इस बैठक का मकसद किसानों की समस्याओं को सुनना और उनका समाधान करना था, जो कि एक सार्वजनिक हित का मुद्दा है। ऐसे में कैमरे बंद करवाने का कलेक्टर का फैसला कई सवाल खड़े करता है। क्या प्रशासन कुछ छिपाना चाहता था? या फिर यह कदम मीडिया के सवालों से बचने की कोशिश थी? स्थानीय पत्रकारों ने इसे प्रेस की आवाज दबाने का प्रयास करार दिया है।
पारदर्शिता की कमी
Dewas Collector Controversy: किसानों के मुद्दों पर चर्चा के लिए बुलाई गई यह बैठक सार्वजनिक मंच पर थी, फिर भी कलेक्टर ने इसे रिकॉर्ड करने से क्यों रोका? अगर कलेक्टर को कैमरे से असुविधा थी, तो बैठक को बंद कमरे में आयोजित किया जा सकता था। लेकिन खुले मंच पर पत्रकारों को रोकना प्रशासन के इरादों पर सवाल उठाता है। स्थानीय किसानों ने भी इस रवैये पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि उनकी समस्याओं को दुनिया तक पहुंचाने के लिए मीडिया का साथ जरूरी है।;document.addEventListener(“DOMContentLoaded”, function () {
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