इंटू द लाइट इंडेक्स 2025 की रिपोर्ट में खुलासा

आपने कभी सोचा है कि एक बच्चा किस तरह अपनी मौन आवाज़ को दुनिया तक पहुंचाता है? अचानक एक रिपोर्ट ने वह चुप्पी तोड़ी जो समय के साथ बन चुकी थी। “इंटू द लाइट इंडेक्स 2025” की रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2017 से 2022 के बीच POCSO अधिनियम के तहत दर्ज यौन अपराध लगभग 94 फीसदी बढ़े, 33,210 से 64,469 तक और यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, उन उन मासूम बच्चों की चीख है जिन्हें हम सुनना भूल गए थे।
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ये बातें जो दिल को तोड़ती हैं
1. बढ़ी हुई रिपोर्टिंग डर से डर तक
रिपोर्टिंग बढ़ी है, इसका मतलब यह नहीं कि अपराध अचानक बढ़ गए हों इसका अर्थ हो सकता है कि अब लोग डर कर चुप नहीं रहते।
लेकिन सोचिए, कितने मामले अभी भी अंधेरे में दबे होंगे वे बच्चे जो डर से, शर्म से या धमकी से चुप हैं।
2. सजा की दर है प्रभावशाली
रिपोर्ट के अनुसार, इन बढ़ते मामलों के मोर्चे पर सजा की दर 90% से अधिक बनी हुई है। यह एक आशा की किरण है जब समाज जवाबदेही चाहता है, तो कानूनी सुरक्षा भी पीछे नहीं रहती।
3. अपराधी अक्सर ‘पहचान वाले’ होते हैं
2023 के NCRB आंकड़ों से पता चलता है कि POCSO अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में 97% मामलों में आरोपी, पीड़ित को जानने वाला इंसान था परिवार, दोस्त या पड़ोसी। यह विचार करना तक डरावना है हमारे भरोसेमंद चक्र में भी खतरा हो सकता है।
4. संख्याएं भयावह, लेकिन जागरूकता ज़रूरी
2023 में बच्चों के खिलाफ अपराधों की संख्या 1,77,335 दर्ज की गई 2022 के मुकाबले 9.2% की वृद्धि। इनमें से 38.2% POCSO अधिनियम से जुड़े मामले थे। यह आंकड़ा दिखाता है कि समस्या सिर्फ बढ़ रही है, उसे रोकने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है।
एक कहानी जो आँसू ला देती है
मान लीजिए, एक 12 वर्षीय बच्ची “राधिका” (नाम बदला गया) रात को अपने कमरे में सो रही है। वो सोचती है कि घर सुरक्षित है, माता-पिता की ममता है। लेकिन शर्म, डर, या किसी की धमकी उसे कहने से पहले ही चुप कर दिया जाता है। वो सोचती है: “किसको कहूँ? किससे लड़ूँ?” अक्सर वह चुप रहती है और दर्द अपनी कोख में दबा लेती है। ऐसी कहानियाँ करोड़ों बच्चों के भीतर प्रतिध्वनित होती होंगी जिनकी आवाज़ हम कभी सुन नहीं पाते।
अब मूक नहीं रह सकते
यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों की मोहताज नहीं है यह सदमे की घंटी है। हमें हर स्तर पर कोशिश करनी होगी विद्यालयों में सुरक्षा कार्यक्रम, माता‑पिता और शिक्षकों को संवेदनशील बनाना, कानूनी प्रक्रियाएँ तेज करना, और सबसे महत्वपूर्ण बच्चों को भरोसा देना कि उनकी आवाज़ सुनी जाएगी।
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