करूर में विजय की रैली बना काल, 39 की मौत और मातम की चुप्पी
विजय की रैली में भगदड़: करूर की वो शाम… जिसे हजारों लोगों ने उम्मीदों और उत्साह के साथ देखा था, अचानक मौत का मंजर बन गई। एक 9 साल की बच्ची के खोने की खबर ने जो हड़कंप मचाया, उसका अंत 39 बेगुनाह जिंदगियों के साथ हुआ। इन जिंदगियों में 16 महिलाएं थीं, 10 मासूम बच्चे जिनके हाथों में तिरंगे और पोस्टर थे, नारे नहीं।

विजय की रैली में भगदड़: भीड़ थी, गर्मी थी, इंतजार था… पर इंतजाम नहीं थे
तमिल सुपरस्टार विजय, जो अब एक उभरते हुए राजनेता हैं, करूर में अपनी पार्टी TVK की रैली को संबोधित करने वाले थे। अनुमति सिर्फ 10 हजार लोगों की थी, लेकिन आए 50 हजार से भी ज्यादा। वो भी 6 घंटे देरी से पहुंचे। गर्मी में, भीड़ में, धूप में तड़पती जनता किसी ‘थलपति’ के दर्शन के लिए जान तक देने को तैयार थी।
लेकिन इंतज़ामों की कमी ने विजय की साख को करूर की मिट्टी में गाड़ दिया। मंच के पास न पुलिस थी, न वॉलंटियर्स। लोगों की भीड़ बस बढ़ती चली गई, और जब बच्ची के गुम होने की घोषणा हुई, तब दिल में बैठे डर ने लोगों को पागल कर दिया। भगदड़ मच गई। बच्चे कुचले गए। महिलाएं गिर पड़ीं। लोग एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते गए।
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मम्मी, यहां से चलो… और फिर वो बच्ची नहीं मिली
विजय की रैली में भगदड़: घटनास्थल पर मौजूद एक शख्स रोते हुए कहता है, मेरी बेटी ने कहा मम्मी यहां से चलो, भीड़ बढ़ रही है… और अगली पल वो मेरे हाथ से छूट गई। मैं उसे ढूंढता रहा, लेकिन फिर एक एंबुलेंस में उसकी पहचान करनी पड़ी। ऐसे कितनी कहानियां उस शाम दफन हो गईं।

विजय की चुप्पी: क्या स्टारडम इंसानियत से बड़ा हो गया?
हादसे के बाद विजय मंच से शांति की अपील करते हैं, और फिर सीधे त्रिची एयरपोर्ट से चेन्नई लौट जाते हैं। ना किसी घायल से मिलने की फुर्सत, ना किसी अस्पताल का दौरा। सोशल मीडिया पर एक X पोस्ट जरूर किया
दिल टूट गया है… प्रार्थना करता हूं।
पर क्या इतनी बड़ी त्रासदी के बाद सिर्फ प्रार्थना काफी है? जब आपका नाम ही हज़ारों को एक जगह खींच लाता है, तो क्या जिम्मेदारी भी उतनी ही नहीं होनी चाहिए?
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सरकार की पहल, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी
CM एम. के. स्टालिन तुरंत हरकत में आए। हाईलेवल मीटिंग ली, जांच आयोग बना, अस्पताल जाकर परिजनों से मिले। मृतकों के परिवार को 10 लाख और घायलों को 1 लाख मुआवजे का ऐलान किया।

पर सवाल वही है अगर सुबह ही नमक्कल में रैली में अफरा-तफरी देखी गई थी, तो क्या करूर की रैली को रोका नहीं जा सकता था?
एक रैली नहीं, एक चेतावनी थी ये
ये सिर्फ विजय की रैली नहीं थी, ये आने वाले समय का आईना भी थी। जब राजनीति में ग्लैमर उतरता है, तो जिम्मेदारी दुगनी हो जाती है। हर बच्चा, हर औरत, हर बुज़ुर्ग जो आपके लिए घर से निकला, उसकी जान की ज़िम्मेदारी भी आपकी बनती है।
क्योंकि राजनीति कोई फिल्म नहीं जहां स्टंट डुप्लीकेट कर लेता है। यहां जो गिरा, वो वाकई गिर गया… और अब लौट कर नहीं आएगा।
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