ये कैसा कलयुग: पति-पत्नी की हत्या से लेकर मासूमों पर अत्याचार तक
ये कैसा कलयुग:नेशन मिरर में आपका स्वागत है। आज हम फिर से एक ऐसे मुद्दे पर विचार करते हैं जिस पर बात करना अब बहुत जरूरी हो गया है। दरअसल ये यही घोर कलयुग है? यहां यही सवाल हम सबके मन में उठता है। खासकर जब हम उन घटनाओं के बारे में सुनते हैं जो रोज़ हमारे समाज संस्कारों को तोड़ रही हैं।
कभी कहीं पति के टुकड़े होते हैं। तो कहीं पत्नी को जान से मार दिया जाता है। वहीं एक ओर घटना है जहां मासूम बच्चों के साथ दरिंदगी होती है। फिर दरिंदगी की हद तब पार होती है जब बच्चियों की उम्र 6 माह से 5 साल होती है। हालांकि इन सबके बावजूद हम चुप हैं। इसके साथ ही हम सहम जाते हैं। क्या सच में हम इस कदर गिर गए हैं?
“राम को जन्म लेना होगा।
उसको सबका हिसाब करना होगा।
जो छुपे बैठे हैं घरों में शराफ़त की चादर ओढ़े दरिंदे
उनका चेहरे से नक़ाब उतर कर सबका हिसाब करना होगा।”
कहीं पैसे की गर्मी हैंतो कहीं पॉवर की ठसक – ये कैसा कलयुग
हालांकि, यह लाइन उन रईसजादों के लिए है जो सड़क पर लग्जरी कारों में बैठकर नशा करते हैं। इसके कारण उनके शौक रास्ते पर चलने वाले लोगों को भारी पड़ जाते हैं। फिर ये बेखौफ उनको कुचल देते हैं। बाद में कहते हैं सॉरी ध्यान दें गलती शायद रोड़ पर चलने वाले आम लोगों की है जो इनकी कारों के सामने जानबूझकर आ जाते हैं।
वास्तव में ये तो अमीर बाप की शरीफ औलादें हैं। इसलिए इनको सजा भी नहीं मिल पाती। अगर ज्यादा हंगामा हुआ तो 300 शब्दों का निबंध लिखना पड़ता है। या फिर कुछ महीने जेल में गुज़रकर वहां भी ऐश करते हैं।
इन कातिलों के जवाब सुनिए –
“मौत ही तो हुई हैं ऐसा कुछ नहीं हैं – वड़ोदरा हादसा।
मैं उनके परिवार से मिलकर सॉरी बोलना चाहूँगा – वड़ोदरा हादसा।”
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दरअसल कुछ लोग अपनी ताकत और पैसे की बदौलत सड़क पर किसी की भी जान ले सकते हैं। हालाँकि देश में क़ानून का राज है। लेकिन वह भी अमीरों का साथ देता है। खास बात यह है कि खुद सुप्रीम कोर्ट के जज भी कह चुके हैं इंसाफ के लिए बहुत पैसे लगते हैं।
इसके अलावा इन लोगों के घरवाले पॉवर और सत्ता के नशे में शायद भूल गए हैं। उदाहरण के लिए पोर्शे पुणे हादसा हिट एंड रन केस और वड़ोदरा हादसा। साथ ही आवाज उठाने पर भी छत्तीसगढ़ में एक पत्रकार को दफना दिया था।
ये कैसा कलयुग: तेल लुटते हुए नजर आते हैं
जब आगरा-लखनऊ हाईवे पर लोग घायल होने वालों को बचाने की बजाय तेल लूट रहे थे। तब यह हमें सिखाता है कि इंसानियत अब कहीं बची है क्या? फिर मध्य प्रदेश का सीधी कांड भी याद आता है। यहां पुलिस वालों को मार दिया जाता है। और पुलिस मजबूरन बस देखती रहती है।
इसके साथ ही मध्य प्रदेश के सीधी कांड और नागपुर की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है। यानी अफवाहें हमारी पूरी दुनिया को नष्ट कर सकती हैं। चाहे आदमियों को मारा जाए। या फिर महिलाओं को भी नहीं छोड़ा जाता। आखिर ये होता क्यों है? क्योंकि हम ही करते हैं और करवाते हैं।
रिश्तों में विश्वास की कमी और खौफनाक परिणाम
शायद ये कलयुग है। इसलिए अब लोग शादी करने से भी डरते हैं। साथ ही कुछ बोलने से भी डरते हैं। क्योंकि ना जाने कब क्या हो जाए। कभी कहीं महिलाओं को आवाज उठाने पर मार दिया जाए। तो कभी प्रेमी के साथ मिलकर पति के ही टुकड़े कर दिए जाते हैं।
जब रिश्तों में प्यार की कमी हो जाती है। तब विश्वास टूट जाता है। और यही विश्वास टूटने की वजह से आजकल पति-पत्नी के रिश्तों में हिंसा की खबरें आम हो गई हैं। क्या हमारे समाज में अब प्यार और रिश्तों का कोई मतलब नहीं रहा?
ये कैसा कलयुग: दरिंदों का इंसानियत से क्या रिश्ता?
जब हम सुनते हैं कि कोई दरिंदा 6 महीने से 5 साल तक की बच्चियों के साथ दरिंदगी करता है। तब हमारी आत्मा झकझोर देती है। क्या ये लोग इंसान हैं? या फिर क्या सोचते होंगे ये लोग? खासकर जब मासूम फूलों की तरह बच्चियों को नोच डालते हैं। फिर उनकी चीखें सुनाई नहीं देतीं। और उनके आंसू नहीं दिखाई देते।
अब यह कैसी दुनिया बन गई है? जहां मासूमों की कोई कद्र नहीं है। उदाहरण के लिए ग्वालियर में 11 साल की बच्ची ने 4 साल के बच्चे को मौत के घाट उतार दिया। फिर मन ना भरा तो उसका एक गड्डे में दफना दिया। और ऊपर से उस पर पत्थर रख दिया। जब पता चला कि बच्चे को किसने मारा है। तब लड़की ने क्या कहा वो सुनें:
“लड़की ने पूछने पर बताया कि मैंने उसको नहीं मारा।
लड़की ने बोला कि हाँ मैंने ही मारा है क्योंकि मुझे वो पसंद नहीं था।”
जो बच्चे मेरी बात नहीं मानते हैं मैं उन बच्चों से नफ़रत करती हूँ।
क्या, इस सोच से हमारी आने वाली पीढ़ी का भविष्य तय होगा? या फिर क्या यह मानसिक विकृति सिर्फ इस बच्ची तक सीमित रहेगी? वरना यह समाज के हर कोने में फैल जाएगी।
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समाज में बदलाव की ज़रूरत
- इन सब को देखकर हमें महसूस होता है कि यह सिर्फ कानून से नहीं सुधरने वाला। इसलिए हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। खासकर रिश्तों में विश्वास, प्यार, और सम्मान की अहमियत को फिर से समझने की आवश्यकता है।
- अब हमें सिर्फ चुप बैठने की बजाय कुछ करना होगा। यानी समाज के हर हिस्से में बदलाव लाने की कोशिश करनी होगी। साथ ही अफवाहों से बचें। और सही जानकारी फैलाएं। अगर किसी भी रिश्ते में असहमति हो। तो हिंसा की बजाय शांति से समाधान खोजें।
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