विश्व शिक्षा दिवस पर जब पूरी दुनिया शिक्षा को अधिकार, ताकत और बदलाव का माध्यम बताती है, उसी वक्त अफगानिस्तान की महिलाओं का दर्द फिर से उभर कर सामने आता है। तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानी महिलाओं को जैसे वैश्विक चर्चा और राजनीति के नक्शे से ही हटा दिया गया हो। अब न उनके हक़ की बात होती है, न यह सवाल उठता है कि उनकी ज़िंदगी में शिक्षा कब और कैसे लौटेगी। वे लड़ रही हैं, लेकिन उनकी लड़ाई में उनके साथ कोई नहीं है।
कक्षा पांच के बाद अंधेरा
अफगानिस्तान में लड़कियों के लिए कक्षा पांच के बाद शिक्षा के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं। यूनिवर्सिटी उनके लिए नहीं हैं, स्कूल उनके लिए नहीं हैं, और सार्वजनिक जीवन से तो उन्हें लगभग बेदखल ही कर दिया गया है। बिना पर्दे के बाहर निकलना मना है। बाज़ार, रेस्टोरेंट, पार्क, हर जगह पाबंदी है। उनके जीवन का दायरा दीवारों तक सीमित कर दिया गया है। वे रो रही हैं, लेकिन उनके आँसू दिखाई नहीं देते।
पुराना वीडियो, लेकिन दर्द आज भी नया
हाल ही में अफगानिस्तान के शिक्षा मंत्री का एक पुराना वीडियो फिर से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। वीडियो में साफ कहा जा रहा है कि महिलाओं की शिक्षा शरिया के अनुसार ही होगी और इस्लामिक व अफगानी तहज़ीब के हिसाब से तालीम दी जाएगी। भले ही वीडियो पुराना है, लेकिन हालात आज भी वही हैं। दर्द पुराना नहीं, लगातार जारी है।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस के मौके पर संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई है कि अफगानिस्तान में लड़कियों को जानबूझकर शिक्षा से वंचित रखा जा रहा है। यूनिसेफ और यूनेस्को ने अपने संयुक्त बयान में साफ कहा कि
अफगानिस्तान दुनिया का इकलौता देश है, जहां महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा पर पूरी तरह पाबंदी है। संस्थाओं ने चेतावनी दी कि अगर यह स्थिति बनी रही तो इसका असर सिर्फ लड़कियों के भविष्य पर नहीं, बल्कि देश की स्थिरता और विकास पर भी पड़ेगा।
साढ़े चार साल की खामोशी
यह एक कड़वी विडंबना है कि साढ़े चार साल से अफगानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध है, लेकिन भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में वह वर्ग, जो कभी तालिबान के सत्ता में आने पर खुश नजर आया था, आज पूरी तरह मौन है। लड़कियों के लिए स्कूल बंद हैं यूनिवर्सिटी बंद हैं लेकिन उनकी पीड़ा पर चर्चा भी बंद है।
