एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर महिला भी अपने ऑफिस में खुद को असुरक्षित महसूस करती है?

दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने इस सवाल का जवाब एक ऐसी सच्चाई से दिया, जिसे हम में से बहुत से लोग नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा,
एक महिला हमेशा डर, शिष्टाचार और माफ़ी के बीच जीती है। ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि उस मानसिकता का आइना हैं जो आज भी लाखों ऑफिसों की दीवारों के पीछे गूंज रही है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा और क्यों?
एक महिला अधिकारी ने 2014 में जम्मू-कश्मीर सरकार के अफसर आसिफ हमीद खान पर यौन उत्पीड़न और धमकी का आरोप लगाया था। पुलिस ने केस में क्लोजर रिपोर्ट दी, विभागीय जांच में भी खान को बरी कर दिया गया। मगर ट्रायल कोर्ट ने केस चलाने का फैसला किया।
जब खान ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, तो कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और 4 सख्त बातें कही:
- विभागीय जांच या पुलिस की रिपोर्ट, FIR को खत्म नहीं कर सकती
- ट्रायल कोर्ट का समन सही था
- यह केस सिर्फ एक शिकायत नहीं, समाज की सड़ी सोच की मिसाल है
- पढ़ी-लिखी महिला होने के बावजूद, उसे उत्पीड़न सहना पड़ा
सोच नहीं बदली है, सिर्फ कानून बदले हैं
कोर्ट ने साफ कहा कि कानून तो बना दिए गए, लेकिन पुरुषों की सोच नहीं बदली। औरतों की सुरक्षा की बातें सिर्फ बैठकों और रिपोर्टों तक सीमित रह गई हैं।
जस्टिस ने शेक्सपियर की पंक्तियों के जरिए बताया कि
एक महिला हर वक्त सोचती है:
पहले मेरा डर, फिर मेरा शिष्टाचार, और आखिर में मेरी बात।
ये सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि हर कामकाजी महिला की कहानी है।
PoSH एक्ट और हकीकत के बीच की खाई
2013 में बना PoSH (Prevention of Sexual Harassment) Act महिलाओं को सुरक्षा देने का वादा करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट भी मान चुका है कि राज्यों और संस्थानों में ICC कमेटियां या तो बनी ही नहीं हैं या सिर्फ नाम की हैं।

Goa University केस में सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि ये लापरवाही सरकारी संस्थानों की साख को चोट पहुंचा रही है। सोचिए, जब यूनिवर्सिटी या मंत्रालय में ही महिलाएं सुरक्षित नहीं, तो बाकी जगहों का क्या हाल होगा?
ये सिर्फ कानून की लड़ाई नहीं, सोच की भी है
इस देश में महिलाओं को नौकरी करने के लिए सिर्फ टैलेंट नहीं, हिम्मत और झेलने की आदत भी चाहिए होती है। एक महिला अगर आवाज उठाती है, तो अक्सर उसे ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। हाईकोर्ट की ये टिप्पणी हमें सिर्फ एक केस की जानकारी नहीं देती, ये हमें हमारी खुद की सोच पर सवाल उठाने का मौका देती है।
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