मोजे और जूते पादुका की श्रेणी में आते हैं
Socks in temple worship: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मोजे और जूते दोनों को ‘पादुका’ यानी पैरों में पहनने योग्य वस्तु माना जाता है। इन्हें पहनकर मंदिर में प्रवेश करना उसी तरह है जैसे किसी पवित्र स्थान में चप्पल पहनकर जाना। पूजा-पाठ के समय शारीरिक और मानसिक शुद्धता बनाए रखना आवश्यक होता है, इसलिए मोजे पहनना अनुचित माना गया है।
शुद्धता के लिए नंगे पांव रहना ज़रूरी
मंदिर में प्रवेश करने से पहले जूते–मोजे उतारने और पैरों को धोने की परंपरा सदियों पुरानी है। संत प्रेमानंद महाराज के अनुसार, मोजे अक्सर गंदगी, पसीने और नकारात्मक ऊर्जा से भर जाते हैं। ऐसे मोजे पहनकर भगवान के सामने खड़े होना असम्मानजनक होता है और पूजा की पवित्रता भंग होती है।
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मोजे पहनकर आने से अशुद्धता का खतरा
मोजे पहनकर लोग दिनभर विभिन्न स्थानों पर घूमते हैं, जिनमें शौचालय और अन्य अशुद्ध स्थान भी शामिल हो सकते हैं। इससे मोजे गंदे हो जाते हैं और वे नकारात्मक ऊर्जा को मंदिर के अंदर ले जा सकते हैं। यही कारण है कि पूजा स्थलों पर इन्हें पहनना वर्जित माना गया है।
नंगे पांव से धरती से जुड़ाव बढ़ता है
कई आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि नंगे पांव रहने से इंसान धरती से सीधे जुड़ता है, जिससे एक विशेष प्रकार की ऊर्जा और शांति प्राप्त होती है। यह जुड़ाव पूजा में एकाग्रता और भक्ति को बढ़ाता है। मोजे पहनने से यह अनुभूति बाधित होती है।
आध्यात्मिकता और भक्ति में आती है गहराई
Socks in temple worship: नंगे पांव रहकर मंदिर में जाने से भक्त का मन ज्यादा शांत, एकाग्र और पवित्र बना रहता है। यह स्थिति भक्ति के लिए आदर्श मानी गई है। मोजे जैसी बाधाएं इस भावनात्मक और आध्यात्मिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं, जिससे पूजा का प्रभाव कम हो सकता है।
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