Why not sit on temple steps: मंदिर हमारी आस्था, ऊर्जा और चेतना का केंद्र होता है। वहां का हर भाग… चाहे वह गर्भगृह हो, द्वार हो या सीढ़ियां विशेष महत्व रखता है। अक्सर लोग थकान या आराम के लिए मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ जाते हैं, लेकिन यह परंपरा के अनुरूप नहीं है। इसके पीछे कई धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक कारण हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है।
आध्यात्मिक ऊर्जा का मार्ग बाधित होता है
मंदिर की सीढ़ियां केवल चढ़ने-उतरने का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऊर्जा-मार्ग होती हैं। श्रद्धालु इन्हीं सीढ़ियों से होकर ईश्वर के दर्शन के लिए बढ़ते हैं। यहां बैठने से उस ऊर्जा के प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। इसे अध्यात्म में ऐसे देखा जाता है जैसे कोई व्यक्ति गंगा की धारा में पत्थर रखकर प्रवाह रोकने का प्रयास कर रहा हो।
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सीढ़ियां,आध्यात्मिक चढ़ाव का प्रतीक
धार्मिक दृष्टिकोण से सीढ़ियां जीवन की आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ने का प्रतीक मानी जाती हैं। उन पर बैठना रुकने और जड़ता का प्रतीक बनता है। यह संदेश देता है कि हम आगे बढ़ने के बजाय ठहर गए हैं — जो कि अध्यात्म की दृष्टि से अनुचित है।
शास्त्रों की मर्यादा और धार्मिक अनुशासन
धर्मशास्त्रों में स्पष्ट निर्देश हैं कि मंदिर में प्रवेश और वहाँ की गतिविधियाँ एक मर्यादा और शुचिता के साथ होनी चाहिए। सीढ़ियां भी मंदिर के पवित्र भाग का हिस्सा मानी जाती हैं। उन पर बैठना न केवल असम्मानजनक माना गया है, बल्कि यह धार्मिक अनुशासन का उल्लंघन भी है।
सामाजिक व्यवस्था और सुविधा का सवाल
Why not sit on temple steps: मंदिर अक्सर भीड़-भाड़ वाले स्थान होते हैं। सीढ़ियों पर बैठने से अन्य श्रद्धालुओं को आवागमन में दिक्कत होती है। इससे अव्यवस्था फैलती है और आपातकालीन स्थिति में दुर्घटना की संभावना भी बढ़ती है। यह दूसरों की श्रद्धा और सुविधा में बाधा पहुंचाना होता है।
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