Why marriage is not allowed during Chaturmas: चातुर्मास हिंदू पंचांग के अनुसार एक विशेष धार्मिक अवधि है, जो हर साल सावन शुक्ल एकादशी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक यानी लगभग चार महीनों तक चलती है। यह समय हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और तपस्वी माना जाता है।
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इस दौरान किसी भी तरह के मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, नई व्यापारिक शुरुआत आदि करने की मनाही होती है। पर ऐसा क्यों है? क्या यह केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक सोच भी है?
आइए जानते हैं इस विशेष नियम के पीछे छुपे आध्यात्मिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों को।
क्या है चातुर्मास और कब से शुरू होता है?
‘चातुर्मास’ का अर्थ है ‘चार महीने’। यह अवधि वर्षा ऋतु से शरद ऋतु तक की मानी जाती है और इसमें शामिल हैं सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास।
चातुर्मास की शुरुआत सावन शुक्ल एकादशी (जिसे देव शयन एकादशी कहा जाता है) से होती है और इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी (देव उठनी एकादशी) को होता है।
मांगलिक कार्य क्यों नहीं होते?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर चार महीनों की योग-निद्रा में चले जाते हैं। जब सृष्टि के पालनकर्ता ही विश्राम में होते हैं, तब मांगलिक कार्यों को अशुभ माना जाता है, क्योंकि इन कार्यों में देवताओं का आशीर्वाद पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो पाता।
एक मीडिया इंटरव्यूं में ज्योतिषाचार्य अंशुल त्रिपाठी ने बताया कि इस समय को पूजा-पाठ, व्रत, भक्ति और आत्मचिंतन के लिए सबसे उत्तम माना गया है। यही वजह है कि हमारे ऋषि-मुनियों और बुजुर्गों ने इस समय में शादियों जैसे आयोजनों को स्थगित रखने की सलाह दी है।

बदलता मौसम और स्वास्थ्य संबंधी कारण…
धार्मिक कारणों के अलावा, चातुर्मास में मांगलिक कार्य न करने के पीछे एक वैज्ञानिक और व्यावहारिक सोच भी है। यह समय वर्षा ऋतु और उसके बाद के मौसम परिवर्तन का होता है।
1. वातावरण में आर्द्रता (नमी) बढ़ जाती है जिससे संक्रमण और बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
2. भोजन जल्दी खराब होता है, और ज्यादा भीड़-भाड़ वाले आयोजनों में पेट से जुड़ी बीमारियां फैल सकती हैं।
3. हमारे पूर्वजों ने इन समस्याओं को देखते हुए तय किया कि इस समय विवाह जैसे भारी जनसमूह वाले कार्यक्रम न हों।
इस प्रकार, चातुर्मास के नियमों में धर्म और विज्ञान का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता है।
आत्मिक और मानसिक शुद्धि का समय…
चातुर्मास का उद्देश्य केवल मांगलिक कार्यों को रोकना नहीं है, बल्कि इसे आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन का समय माना गया है।
इस दौरान भक्तजन:-
1. व्रत और उपवास करते हैं,
2. सात्विक भोजन का पालन करते हैं,
3. धार्मिक ग्रंथों का पाठ, कीर्तन, जप और ध्यान करते हैं,
4. स्वयं को आत्मिक रूप से शुद्ध करते हैं।
ऐसे में अगर कोई विवाह या गृह प्रवेश जैसे आयोजनों में व्यस्त रहेगा, तो उसकी भक्ति में विघ्न पड़ सकता है।
चातुर्मास में क्या करना चाहिए?
इस पवित्र समय को और भी फलदायी बनाने के लिए निम्न कार्यों को करने की सलाह दी जाती है:
1. सात्विक भोजन करें, मांस-मदिरा से दूरी बनाएं।
2. प्रतिदिन विष्णु सहस्रनाम, श्रीरामचरितमानस, गीता या शिव पुराण का पाठ करें।
3. दान-पुण्य और पितरों के लिए तर्पण करें।
4. मंदिर जाएं और विशेष रूप से भगवान विष्णु और शिवजी की आराधना करें।
चातुर्मास के बाद क्यों शुरू होते हैं विवाह जैसे शुभ कार्य?
चातुर्मास की समाप्ति कार्तिक शुक्ल एकादशी को होती है, जिसे देव उठनी एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योग-निद्रा से जागते हैं।
इसके साथ ही मांगलिक कार्यों का शुभ मुहूर्त शुरू हो जाता है। यही कारण है कि दीपावली के बाद शादियों का मौसम ज़ोरों पर होता है।
