Lord Shiva and King Vasuki Mythology: हिंदू धर्म में भगवान शिव को संहार और कल्याण के देवता के रूप में पूजा जाता है। भारत में सावन का महीना शिव जी का प्रिय महिना माना जाता है, यह महिना भगवान शिव के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। ये महीना भक्ति, तप, व्रत और पूजा का प्रतीक होता है। सावन का आगमन होते ही मंदिरों में शिवभक्तों की भीड़ उमड़ने लगती है। महिलाएं, पुरुष और खासकर कुंवारी कन्याएं शिवजी की पूजा में लीन हो जाती हैं। इस बार सावन की शुरुआत तो 11 जुलाई से हो चुकी हैं।
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भागवान शिव की वेशभूषा और आभूषण सभी देवताओं से बिल्कुल अलग हैं। भागवन शिव के सिर पर चंद्रमा, जटाओं में गंगा, शरीर पर भस्म और गले में नागराज वासुकि का वास—यह रूप अत्यंत गूढ़ और प्रतीकात्मक अर्थों से भरपूर है। विशेष रूप से उनके गले में लिपटे नाग का अपना एक धार्मिक, आध्यात्मिक और पौराणिक महत्व है। आज हम इस आर्टिकल में भगवान शिव के गले में नाग कैसे विराजमान हुए और इससे जुड़े रहस्य के बारें बताएंगे।
नागराज वासुकि भगवान शिव के भक्त…
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान शिव हिमालय के कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। और यही बहुत सारें नाग वंश के सांप भी रहते हैं। नाग वंश के प्रमुख नागराज वासुकि, भगवान शिव के परम भक्त माने जाते हैं। मान्यता है कि वासुकि चाहते तो वो सदैव अपने आराध्य के समीप रहें। उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया और गले में धारण कर लिया। तभी से नागराज वासुकि भगवान शिव के गले के आभूषण बन गए। और उनके साथ रहने लगे।

समुद्र मंथन में नागराज वासुकि ने निभाई थी अहम भूमिका…
पुराणों के अनुसार, देवताओं और असुरों के बीच जब समुद्र मंथन का निर्णय हुआ, लेकिन उसे मथने के लिए रस्सी की आवश्यकता पड़ी। तब भगवान शिव के भक्त वासुकि नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया। इस मंथन के दौरान कई दिव्य रत्नों के साथ-साथ एक भयंकर विष—हलाहल—भी निकला, जिससे सृष्टि का अंत हो सकता था। उस समय भगवान शिव ने वह विष पीकर अपने कंठ में रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।
वासुकि नाग की इस भूमिका ने उनके महत्व को और बढ़ा दिया। यह भी मान्यता है कि वासुकि के सिर पर दिव्य मणि होती है, जो उन्हें और अधिक प्रभावशाली बनाती है।

सच्चा भक्त कैसा भी हो आसानी से स्वीकार लेते हैं शिव…
भगवान शिव द्वारा विषैले नाग को अपने गले में धारण करने का एक और प्रतीकात्मक संदेश यह है कि ईश्वर दुर्जनों को भी अपने पास स्थान देते हैं, यदि वे अच्छे कर्म करें। यह शिव के उदार हृदय और समर्पित भक्ति को सम्मान देने की परंपरा को दर्शाता है।
श्रीकृष्ण से भी जुड़ा है वासुकि का नाम…
वासुकि नाग का उल्लेख न केवल शिव कथाओं में बल्कि श्रीकृष्ण की जीवन गाथा में भी आता है। मान्यता है कि जब वासुदेव श्रीकृष्ण को कंस की जेल से निकालकर गोकुल ले जा रहे थे, तब यमुना नदी में आई भयंकर आंधी-तूफान के दौरान वासुकि नाग ने अपने फन से श्रीकृष्ण और वासुदेव की रक्षा की थी।

शिव के आभूषणों में अन्य नाग भी हैं शामिल…
वासुकि ही नहीं, भगवान शिव के शरीर पर और भी कई नाग विराजमान हैं। उनके कानों में पद्म और पिंगल नामक नाग हैं। उनकी बाहों पर कंबल और धनंजय नाग बाजूबंद के रूप में शोभायमान हैं। हाथों में अश्वतर और तक्षक नाग कंगनों के रूप में हैं, और कमर में नीले रंग का नील नामक नाग लिपटा हुआ है।
आध्यात्मिक प्रतीक भी है नागधारण….
नागधारण का अर्थ केवल सजावट नहीं है, बल्कि यह कई गहरे प्रतीकों से जुड़ा है—जैसे अहंकार पर नियंत्रण, भय पर विजय, और आध्यात्मिक ऊर्जा (कुंडलिनी) का जागरण। भगवान शिव का नागों से संबंध दर्शाता है कि यदि सबसे विषैले और खतरनाक जीव भी भक्ति और निष्ठा से ईश्वर से जुड़ जाएं, तो उन्हें भी स्थान मिल सकता है।
