Vat Savitri Vrat Special: भारतीय संस्कृति में महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए कई व्रत करती है, जिसमें से एक वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या को किया जाता है, और इसे खास तौर पर उत्तर भारत की विवाहित महिलाएं श्रद्धा और भक्ति के साथ करती हैं।
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इस दिन वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है, जो अक्षय पुण्य, दीर्घायु और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। वट वृक्ष को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास स्थल माना गया है, वहीं सावित्री को पतिव्रता धर्म की प्रतीक। इन दोनों के मिलन से इस व्रत को अत्यधिक पवित्र और फलदायी माना गया है।
वट सावित्री व्रत की पूजा की तैयारी…
व्रत करने से पहले इसकी सही विधि और नियमों को जानना जरूरी है। वट सावित्री व्रत सूर्योदय से पहले शुरू किया जाता है।
1. महिलाओं को व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए।
2. सात प्रकार के अनाज (सत्तू, मूंग, गेहूं, चना, धान, तिल, उड़द) को धोकर तैयार कर लें।
3. पूजा में उपयोग के लिए पवित्र जल, रोली, सिंदूर, मौली, अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप, मिठाई, आदि तैयार रखें।
4. सावित्री और सत्यवान की मिट्टी की मूर्ति बनाएं या चित्र स्थापित करें।
5. पूजा के लिए एक पीला या लाल वस्त्र, जिसमें महिलाएं तैयार होकर व्रत करें, विशेष माना जाता है।

पूजा की विधि…
1. सबसे पहले घर या मंदिर में वट वृक्ष के नीचे पूजा की सामग्री रखें।
2. व्रत करने वाली महिलाएं बरगद के पेड़ की परिक्रमा करती हैं और उसे मौली (कच्चा धागा) लपेटती हैं।
3. वट वृक्ष के नीचे सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या चित्र रखकर पूजा की जाती है।
4. व्रत कथा सुनना अनिवार्य माना गया है। महिलाएं एक-दूसरे को कथा सुनाती हैं।
5. पूजा के बाद सात बार पेड़ की परिक्रमा कर उसके जड़ में जल चढ़ाया जाता है और सत्तू या मिठाई चढ़ाई जाती है।
व्रत कथा: सावित्री और सत्यवान की अमर प्रेमगाथा…
इस व्रत के पीछे सावित्री और सत्यवान की वह कथा है जो पति-पत्नी के प्रेम, नारी शक्ति और धैर्य का अनुपम उदाहरण है।
पौराणिक कथा…
राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री अत्यंत सुंदर, बुद्धिमान और धार्मिक थी। जब वह विवाह योग्य हुई, तो उसने स्वयं पति चुनने का निर्णय लिया। उसने वनवासी और निर्धन, लेकिन धर्मात्मा सत्यवान को अपना जीवनसाथी चुना।
ऋषि नारद ने राजा अश्वपति को चेताया कि सत्यवान की जीवन अवधि मात्र एक वर्ष शेष है, लेकिन सावित्री ने दृढ़ निश्चय किया कि वह उसी से विवाह करेगी।

विवाह के पश्चात एक वर्ष बाद, जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काट रहा था, उसकी मृत्यु हो गई। यमराज उसकी आत्मा को लेने आए। सावित्री ने तीन दिन तक उपवास किया और अपने पतिव्रत धर्म से यमराज को प्रसन्न किया। यमराज ने उसे वरदान देने की इच्छा जताई।
सावित्री ने चतुराई से पहला वर मांगा – ससुर का नेत्रों का पुनः मिलना, दूसरा – पुत्रों का राज्य प्राप्त करना, और तीसरा – अपने गर्भ से सत्यवान के संतान होने का वर। यमराज को विवश होकर सत्यवान को जीवनदान देना पड़ा।
इस तरह सावित्री के धर्म, संयम और श्रद्धा से मृत्यु को भी परास्त किया गया। इस घटना की स्मृति में ही वट सावित्री व्रत का प्रचलन हुआ।
वट वृक्ष का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व…
इस वृक्ष को भारत में देववृक्ष कहा जाता है। इसे त्रिदेवों का वास स्थल भी कहा गया है। ब्रह्मा जी जड़ों में, विष्णु तने में और शिव शाखाओं में वास करते हैं। इसलिए इसे पूजनीय माना गया है।
विज्ञान की दृष्टि से…
1. वट वृक्ष 24 घंटे ऑक्सीजन देता है, जो पर्यावरण शुद्ध करता है।
2. इसकी छांव और पत्तियां मानसिक शांति देती हैं और तनाव कम करती हैं।
3. आयुर्वेद में इसके पत्ते, छाल और जड़ से विभिन्न रोगों का उपचार किया जाता है – जैसे डायबिटीज, घाव, उल्टी आदि।

व्रत करने के लाभ…
1. पति की दीर्घायु और सुखमय दांपत्य जीवन..
यह व्रत पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है। मान्यता है कि सावित्री की तरह स्त्री अपने पतिव्रत से पति की आयु बढ़ा सकती है।
2. सौभाग्य और वैवाहिक सुख की प्राप्ति..
वट सावित्री व्रत स्त्री के जीवन में अखंड सौभाग्य बनाए रखता है। जो महिलाएं यह व्रत श्रद्धा से करती हैं, उनके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
3. संतान प्राप्ति और परिवार में समृद्धि..
जिन स्त्रियों को संतान की इच्छा होती है, उनके लिए भी यह व्रत फलदायी माना गया है।
4. धैर्य, संकल्प और मनोबल की वृद्धि..
सावित्री जैसा धैर्य और आत्मबल हर स्त्री में आए – यही इस व्रत का संदेश है। यह व्रत महिलाओं को मानसिक रूप से भी सशक्त बनाता है।
5. पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति..
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, वट सावित्री व्रत करने वाली स्त्री को अगले जन्म में भी उत्तम जीवन मिलता है। उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।
