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2 साल के निचले स्तर पर थोक महंगाई : आपकी जेब पर फर्क पड़ा?

Shital Sharma August 15, 2025

क्या महंगाई वाकई कम हुई है, या आंकड़ों का खेल है?

एक आम भारतीय के लिए महंगाई का मतलब है सब्ज़ी वाला कितने में टमाटर दे रहा है, और गैस सिलेंडर कब फिर महंगा हुआ?
लेकिन जब हम सुनते हैं कि “महंगाई गिर गई है”, तो मन में पहला सवाल यही आता है “तो जेब क्यों नहीं हल्की हुई?”

  wpi inflation may 2025 lowest since 2024

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2025 में थोक महंगाई दर (WPI) -0.58% रही, यानी कीमतें घटी हैं। ये बीते दो साल का सबसे निचला स्तर है। तो आइए, समझते हैं इस गिरावट का मतलब, और क्या इससे वाकई हमारी थाली, जेब और बाजार पर कोई फर्क पड़ा है?

जुलाई में क्या-क्या हुआ सस्ता?

थोक महंगाई यानी Wholesale Price Index (WPI) के आंकड़े बताते हैं कि  खाने-पीने की चीजों की महंगाई 0.26% से घटकर -2.15% हो गई।  फ्यूल और पावर की महंगाई -2.65% से -2.43% हो गई।  मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की महंगाई 1.97% से बढ़कर 2.05% हुई।  प्राइमरी आर्टिकल्स (दालें, अनाज, सब्ज़ियां) की महंगाई -3.38% से -4.95% पर आ गई। मतलब साफ है कई जरूरी चीजों के दाम थोक बाजार में घटे हैं।

लेकिन थोक महंगाई गिरने का मतलब क्या?

थोक महंगाई उन कीमतों को दिखाती है जिन पर कंपनियां या व्यापारी एक-दूसरे से सौदे करते हैं।
मतलब, जो गिरावट आज दिख रही है, उसका असर आम ग्राहक यानी आप और मैं, कुछ हफ्तों या महीनों में महसूस करते हैं।

लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर चीज सस्ती हो। उदाहरण के लिए:

  • फैक्ट्रियों से निकले प्रोडक्ट्स जैसे प्लास्टिक, मेटल या केमिकल्स के दाम अभी भी बढ़ रहे हैं।

  • तेल और गैस की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी हुई है।

इसलिए खर्च में कोई बड़ी कटौती फिलहाल जेब में सीधी महसूस नहीं होती।

रिटेल महंगाई भी गिरी, क्या खुशखबरी है?

रिटेल महंगाई यानी Consumer Price Index (CPI) वो इंडेक्स है जो हमारी रोजमर्रा की ज़रूरतों पर खर्च को दर्शाता है। जुलाई में ये घटकर 1.55% पर आ गई है ये पिछले 8 साल का सबसे निचला स्तर है। जुलाई 2017 के बाद यह पहली बार है जब रिटेल महंगाई इतनी नीचे आई है।

तो क्या अब सब्ज़ियां, दूध, राशन सब सस्ता मिलेगा? कागज़ पर हां। मिंटो के बाजार में शायद नहीं। क्योंकि थोक और रिटेल के बीच का फर्क, मुनाफा, टैक्स, ट्रांसपोर्ट और सप्लाई चेन जैसे कारणों से फिसल जाता है।

 महंगाई कैसे मापी जाती है? एक आम आदमी की भाषा में समझें:

भारत में महंगाई को मापने के दो तरीके हैं:

  1. WPI (थोक महंगाई)
    * व्यापारी-से-व्यापारी सौदे की कीमतें
    * इससे पता चलता है कि बाजार में उत्पादन और सप्लाई की दिशा क्या है।

  2. CPI (खुदरा महंगाई)
    * ग्राहक जो दुकानदार से खरीदता है उसकी कीमत
    * यही आम लोगों की खर्च की असली तस्वीर है।

WPI का असर धीरे-धीरे CPI पर आता है, लेकिन दोनों में टाइम गैप होता है।

सरकार क्या कर सकती है?

सरकार WPI को सीधे कंट्रोल नहीं कर सकती, लेकिन टैक्स कटौती, सब्सिडी या इंपोर्ट-एक्सपोर्ट पॉलिसी के ज़रिए असर डाल सकती है। जैसे 2022 में जब कच्चे तेल के दाम बहुत बढ़े, तब सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाई थी, ताकि पेट्रोल-डीजल के दाम नीचे आएं। लेकिन हर बार ऐसा करना आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं होता।

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