केंद्र की कड़ी आपत्ति! TMC ने किया विरोध, जानें क्या है विवाद
कोलकाता, 26 जुलाई 2025 – पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आनंद बोस ने ममता बनर्जी सरकार द्वारा पेश किए गए अपराजिता विधेयक को वापस भेज दिया है। इस बिल में राज्य सरकार ने महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए सख्त सजा प्रावधानों का प्रस्ताव रखा था, लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई है। राज्यपाल ने इसे राष्ट्रपति के पास भेजने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बदलावों की सिफारिश की थी।

केंद्र की आपत्ति: भारतीय न्याय संहिता में बदलाव
राज्यपाल के राजभवन से मिली जानकारी के मुताबिक, केंद्र ने इस विधेयक में कई खामियों पर आपत्ति जताई थी। विशेष रूप से, इस बिल में दुष्कर्म जैसे अपराधों में सख्त सजा का प्रावधान किया गया था, जो भारतीय न्याय संहिता (Indian Penal Code) की कई धाराओं में बदलाव की मांग करता था। इसके साथ ही, राज्यपाल ने इस बिल में कुछ प्रावधानों पर संशोधन की सिफारिश की थी, जिनमें रेप केस में सीधी फांसी और कोमा में चली गई पीड़िता की स्थिति में अनिवार्य फांसी जैसे प्रावधान शामिल थे।
टीएमसी का विरोध
इस बिल को पश्चिम बंगाल विधानसभा में 3 सितंबर 2024 को पेश किया गया था, और टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) ने इसकी कड़ी आलोचना की है। टीएमसी नेताओं ने कहा कि यह बिल राज्य सरकार की योजनाओं के खिलाफ है और इसे नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने कहा है कि वे इस विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे।

राज्यपाल ने जिन प्रावधानों पर उठाई आपत्तियां
राज्यपाल ने बिल में खास तौर पर निम्नलिखित तीन प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी:
- रेप के मामलों में सीधी फांसी या उम्रकैद: इस प्रावधान में कहा गया था कि अगर रेप के बाद पीड़िता की मौत हो जाए या वह कोमा में चली जाए, तो दोषी को अनिवार्य रूप से फांसी की सजा दी जाएगी।
- 12 और 16 साल की पीड़ितों में फर्क करने वाला प्रावधान हटाने की सिफारिश: बिल में बच्चों के लिए अलग अलग सजा देने का प्रस्ताव था, जिसे राज्यपाल ने स्वीकार नहीं किया।
- आदतन अपराधियों के लिए उम्र कैद: आदतन अपराधियों के लिए भी उम्र भर की सजा का प्रावधान था, जिसे राज्यपाल ने चुनौती दी।
बिल के प्रमुख प्रावधान और बदलाव
- बिल का नाम: बिल का नाम अपराजिता वुमन एंड चाइल्ड बिल 2024 रखा गया था। इसका उद्देश्य वेस्ट बंगाल क्रिमिनल लॉ एंड अमेंडमेंट में बदलाव करना और महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में कड़ी सजा देना था।
- रेप केस की जांच: बिल के अनुसार, रेप के मामलों में जांच 21 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी। यदि यह समय सीमा बढ़ानी हो, तो इसे संबंधित पुलिस अधिकारियों से लिखित मंजूरी लेनी होगी।
- स्पेशल टास्क फोर्स: इस बिल में अपराजिता टास्क फोर्स बनाने का प्रस्ताव भी था, जिसे DSP की अगुआई में विशेष मामलों की जांच करनी थी।
- स्पेशल कोर्ट: बिल में स्पेशल कोर्ट बनाने का प्रस्ताव था ताकि रेप और यौन शोषण के मामलों का शीघ्र समाधान हो सके।
टीएमसी का विरोध और आगे की रणनीति
टीएमसी के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने राज्यपाल के फैसले पर कहा कि यह ममता सरकार को कमजोर करने की साजिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीति की है और इस विधेयक के अच्छे उद्देश्य को नकारा है। टीएमसी ने घोषणा की है कि वे इस विधेयक को लेकर सड़कों पर उतरकर विरोध करेंगे।
संबंधित मुद्दे और आगे का रास्ता
अपराजिता विधेयक में प्रस्तावित सजा और प्रावधानों के बावजूद, राज्यपाल और केंद्र सरकार की आपत्तियों ने राज्य सरकार के इस प्रयास को ठंडे बस्ते में डाल दिया। फिलहाल, यह विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा गया है, जिनकी मंजूरी के बाद ही इसे कानून का रूप मिलेगा। इसके अलावा, केंद्र और राज्य सरकार के बीच बढ़ते विवादों के बीच इस विधेयक की किस दिशा में स्वीकृति मिलती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
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