
21 जुलाई 2025 को अचानक इस्तीफा देने वाले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का पद आज खाली हो गया है। उनकी जगह संविधान ने ढाला है रास्ता जल्द ही देश को एक नया उपराष्ट्रपति मिलेगा। चुनाव आयोग ने अधिसूचना जारी कर दी है नामांकन की अंतिम तारीख 21 अगस्त, और 9 सितंबर को मतदान। एक संवैधानिक व्यवस्था, जो लोकतंत्र की मजबूती को दर्शाती है।
अचानक इस्तीफा और संवैधानिक जटिलता
धनखड़ ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए 19 महीने पहले अपने पद से इस्तीफा दे दिया जबकि उनकी अवधि अगस्त 2027 तक थी। तीन उपराष्ट्रपतियों में सिर्फ वही हैं जिन्होंने बीच में ही पद छोड़ा। संविधान के अनुच्छेद 67(a) के तहत उनका त्यागपत्र तुरंत मान्य हो गया, और अब अनुच्छेद 68(2) के तहत चुनाव जल्द से जल्द कराने की ज़िम्मेदारी बन गई।
इस अधिसूचना ने उस संवैधानिक अस्पष्टता को उजागर कर दिया है कहाँ लिखा है, ‘जल्द से जल्द’ की सीमा? राष्ट्रपति चुनाव की तरह छह महीने की सीमा नहीं दी गई है। सवाल यह उठता है कि “कब तक चुनाव निबटाना सर्वोत्तम माना जाएगा?”
चुनाव प्रक्रिया: नामांकन से मतगणना तक का मानचित्र
| प्रक्रिया | तारीख |
|---|---|
| अधिसूचना जारी | 7 अगस्त 2025 |
| नामांकन की अंतिम तिथि | 21 अगस्त 2025 |
| नाम-पत्र की जांच | 22 अगस्त 2025 |
| प्रत्याशी वापसी की अंतिम तिथि | 25 अगस्त 2025 |
| मतदान और मतगणना | 9 सितंबर 2025 |
मतदाता कौन हैं?
- 233 निर्वाचित + 12 नामांकित राज्यसभा सदस्य
- 543 निर्वाचित लोकसभा सदस्य
- कुल मिलाकर लगभग 782 सांसद वोटर होंगे, प्रत्येक की वोटिंग वैल्यू एक होगी।
मतगणना का तरीका: गुप्त मतदान और एकल परिचरित वोट प्रणाली (Single Transferable Vote) से विभागों द्वारा प्राथमिकता के अनुसार मतगणना होती है।
राजनीतिक मोर्चा: NDA का प्रचार, विपक्ष की शंका
चुनाव आयोग की अधिसूचना के साथ भारत सरकार और भाजपा पूरी तैयारी में हैं। NDA गठबंधन ने संभावित उम्मीदवारों की सूची शुरू कर दी है जिसमें राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े, हरिवंश नारायण सिंह, नितीश कुमार, जेपी नड्डा जैसे नाम शामिल हैं।
शिवसेना-NDA गठबंधन में भी एकनाथ शिंदे ने “उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार को संपूर्ण समर्थन” का ऐलान किया। इससे NDA के पास अब एक स्पष्ट रास्ता दिखने लगा है वहीं विपक्ष में शशि थरूर जैसे नेता सवाल उठा रहे हैं कि क्या उम्मीदवार का चयन शामिल प्रक्रिया से होगा, या सिर्फ सत्तारूढ़ दल का फैसला माना जाएगा? उनकी चिंता लोकतांत्रिक पहुँच की है
मानवीय जुड़ाव: ये पद सिर्फ राजनीति नहीं है, संवैधानिक संरचना है
कभी-कभी हमें भूल जाते हैं कि उपराष्ट्रपति सिर्फ एक संवैधानिक पद नहीं वो राज्यसभा के अध्यक्ष भी होते हैं। आज, इस पोस्ट की खाली कुर्सी केवल औपचारिक नहीं है वो लोकतंत्र के बीच का पुल है।

जब धनखड़ ने इस्तीफा दिया, तो वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं गया उनकी 19 महीने की यात्रा, संसद की सुनवाई, विधेयकों पर बहस, और संघीय संवाद का क्रम रुक गया। अब यह बारी उस व्यक्ति की होगी जो लोकतंत्र के उच्चतम मंच पर फर्श से फिरात तक की गवाही दे सके।
9 सितंबर भारत को फिर से पद मिलेगा, पर संवैधानिक चेतना भी मजबूत होनी चाहिए
9 सितंबर 2025 को वोटिंग होगी, और संभवतः उसी दिन परिणाम। नए उपराष्ट्रपति को पूरा पांच साल का कार्यकाल 2025 से शुरू होगा क्योंकि मध्यकालीन चुनाव के बाद भी नया कार्यकाल उसी दिन से गणना होता है।
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