❝ जब एक पद खाली होता है, तो सियासत की कुर्सियां हिलती हैं ❞
21 जुलाई की शाम थी। संसद का सत्र चल रहा था। सबकुछ सामान्य सा लग रहा था नेताओं की बहसें, विपक्ष के सवाल, सत्ता पक्ष की रणनीति… लेकिन तभी एक खबर आई जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया।
74 वर्षीय धनखड़ का कार्यकाल अभी दो साल और चलना था। लेकिन उन्होंने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए पद छोड़ दिया। और इसके साथ ही देश के दूसरे सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए नया अध्याय शुरू हो गया।
अब सवाल उठता है कौन होगा भारत का अगला उपराष्ट्रपति?
9 सितंबर वो दिन जब नई पहचान बनेगी
चुनाव आयोग ने ऐलान किया है कि 9 सितंबर को उपराष्ट्रपति पद के लिए मतदान होगा, और नामांकन की आखिरी तारीख 21 अगस्त रखी गई है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा गर्म है, समीकरण बन रहे हैं, जोड़-तोड़ शुरू हो चुकी है।
लेकिन उपराष्ट्रपति का चुनाव होता कैसे है?
ये कोई आम चुनाव नहीं है। इसमें जनता वोट नहीं देती। सिर्फ सांसद ही वोट डालते हैं लोकसभा और राज्यसभा के सभी निर्वाचित और नामित सदस्य। यानि ये चुनाव सीधे संसद के भीतर लड़ा जाता है।
NDA बनाम INDIA गठबंधन दो ध्रुव, एक मकसद
अब बात करते हैं मौजूदा समीकरण की। संसद में NDA के पास स्पष्ट बहुमत है:
- लोकसभा: NDA – 293 | INDIA – 234
- राज्यसभा: NDA – लगभग 130 | INDIA – 79
कुल मिलाकर NDA के पास 423 सांसदों का समर्थन है जबकि INDIA गठबंधन के पास 313।
मतलब? गणित NDA के पक्ष में है। लेकिन राजनीति सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होती ये धारणा, प्रभाव और रणनीति का भी संगम है। यही वजह है कि भले ही NDA की जीत तय मानी जा रही हो, INDIA गठबंधन मैदान नहीं छोड़ रहा। वो भी एक संयुक्त उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है और यह सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि 2029 की दिशा तय करने वाला एक प्रतीक बन सकता है।
संभावित चेहरे कौन होगा अगला चेहरा?
NDA खेमे में थावरचंद गहलोत (कर्नाटक के राज्यपाल) और ओम माथुर (सिक्किम के राज्यपाल) के नाम चर्चा में हैं। दोनों ही बीजेपी के पुराने, भरोसेमंद चेहरे हैं, जिन्होंने संगठन और संसद दोनों में गहरी पकड़ बनाई है।
दूसरी ओर, INDIA गठबंधन का चेहरा अभी सामने नहीं आया, लेकिन रणनीति साफ है वो एक ऐसा चेहरा उतारेंगे जो सांकेतिक रूप से देश को एक संदेश दे सके कि विपक्ष अभी भी मजबूती से खड़ा है।
लेकिन ये चुनाव इतना अहम क्यों है?
क्योंकि उपराष्ट्रपति सिर्फ पद का नाम नहीं होता। वो राज्यसभा के सभापति भी होते हैं यानी संसद के ऊपरी सदन के संचालन की जिम्मेदारी उन्हीं की होती है। एक मजबूत, निष्पक्ष और अनुभवशील उपराष्ट्रपति, संसद की गरिमा को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाता है। ऐसे में ये सिर्फ एक चुनाव नहीं, लोकतंत्र के संतुलन की नींव है।
जनता क्या महसूस कर रही है?
सामान्य जनता के लिए ये खबर शायद एक लाइन में सिमट जाए, लेकिन जो लोग लोकतंत्र को समझते हैं, उनके लिए ये बदलाव मायने रखता है। क्योंकि जब राजनीति में बड़े चेहरे बदलते हैं, तो नीतियों, संवाद और संसद की दिशा भी बदलती है। और शायद यही वजह है कि अब हर राजनीतिक दल इस चुनाव को सिर्फ जीत की दृष्टि से नहीं, बल्कि अपने विज़न की तरह देख रहा है।
यह सिर्फ एक पद नहीं, भविष्य की परछाई है
उपराष्ट्रपति का चुनाव भले सीमित दायरे में हो, लेकिन इसका प्रभाव देश की राजनीति पर दूरगामी होता है। आने वाले दिनों में ये देखना रोचक होगा कि क्या NDA अपने अनुभव से बाज़ी मारता है या INDIA गठबंधन कोई नई कहानी लिखने में सफल होता है?
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