वैष्णो देवी में लैंडस्लाइड की खौफनाक दास्तान– पल भर में सब खत्म हो गया
वैष्णो देवी… एक नाम, एक आस्था, एक विश्वास। जहां हर दिन हजारों श्रद्धालु अपनी मुरादों की थाली लेकर माँ के चरणों में चढ़ते हैं। लेकिन मंगलवार, 26 अगस्त 2025 को, इस पवित्र ट्रैक पर मातम छा गया।

दोपहर के करीब 3 बजे जब ज़्यादातर लोग दर्शन के लिए ट्रैक पर थे, तभी अर्धकुमारी मंदिर के पास अचानक पहाड़ दरकने लगा। जो श्रद्धालु भजन गा रहे थे, वही अब चिल्ला रहे थे “भागो! चट्टान गिर रही है!
हादसा: जब पहाड़ टूट पड़ा इंसानों पर
इंद्रप्रस्थ भोजनालय से कुछ ही दूरी पर बड़ी-बड़ी चट्टानें और पेड़ अचानक गिरने लगे। लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले कई जानें पत्थरों और मलबे के नीचे दब गईं।
शाम होते-होते मौत का आंकड़ा 7 पहुंचा, और रात के बाद सुबह उजाला नहीं, बल्कि एक काली खबर लेकर आई 32 लोगों की मौत।
मैं अभी भी कांप रहा हूं…
एक चश्मदीद ने रोते हुए कहा, “मेरे साथ आए 6 लोग अब तक नहीं मिले। मैं पीछे था… तभी पहाड़ गिरा, और सब तबाह हो गया।
एक महिला श्रद्धालु बोली, “मैं और मेरे पति किसी तरह बच निकले… पर मेरे तीनों बच्चे अब तक नहीं मिले। कैसे जिऊंगी अब?
पंजाब की किरण कहती हैं, “मैं दर्शन कर नीचे लौट रही थी तभी पत्थर गिरने लगे… दौड़ी, गिर पड़ी, घायल हुई… पर कम से कम जिंदा हूं।
प्रशासन का संघर्ष: जब राहत भी मुश्किल में थी
लगातार भारी बारिश के कारण बचाव कार्य में मुश्किलें और बढ़ गईं। मलबा इतना था कि कई लोगों तक पहुंचना नामुमकिन लग रहा था।
23 से अधिक घायल, दर्जनों लापता और हर बीतता पल आशा को कम कर रहा था।
कटरा से जम्मू तक रेल सेवाएं ठप कर दी गईं। नॉर्दर्न रेलवे ने 22 ट्रेनें रद्द, 27 को शॉर्ट टर्मिनेट कर दिया।
यात्रा को स्थगित कर दिया गया। पूरा वैष्णो देवी परिसर खाली कराया गया।
भरोसे का सफर जो टूटा, लेकिन इंसानियत ने थामा हाथ
ऐसे हादसे सिर्फ जान नहीं लेते, बल्कि यादों में गहरे जख्म छोड़ जाते हैं। लेकिन इस त्रासदी के बीच भी मानवता की मिसालें दिखीं। स्थानीय युवक पहाड़ों में फंसे लोगों तक खाना-पानी लेकर पहुंचे। NDRF और SDRF की टीमें लगातार 36 घंटे से बिना थमे राहत कार्य में जुटीं रहीं। डॉक्टरों की टीम सीधे कटरा अस्पताल पहुंची और घायलों का इलाज शुरू किया।
अब सवाल ये नहीं कि बारिश कितनी हुई, बल्कि ये कि हम कितने तैयार थे?
भारत में हर साल मानसून के साथ आपदाएं भी आती हैं। लेकिन क्या वैष्णो देवी जैसे संवेदनशील इलाकों में पर्याप्त सुरक्षा इंतज़ाम नहीं होने चाहिए थे?
- क्या पुराने ट्रैक पर सख्त निगरानी नहीं होनी चाहिए?
- क्या मौसम पूर्वानुमान को नज़रअंदाज़ किया गया?
- क्या यात्रा को समय रहते रोका जा सकता था?
इन सवालों के जवाब अभी नहीं हैं… लेकिन अगर अब भी न मिले, तो अगला हादसा सिर्फ एक खबर नहीं, हमारी लापरवाही का नतीजा होगा।

श्रद्धा बनी पीड़ा, पर उम्मीद ज़िंदा है
आज भी वैष्णो देवी की पहाड़ियां गूंज रही हैं लेकिन भजनों से नहीं, कराहों से। माँ के दरबार में फूल नहीं, चप्पलें बिखरी हैं। भक्तों की आंखों में दर्शन की नहीं, अपनों की झलक की तलाश है। लेकिन हम भारतवासी हैं। हम टूटते हैं, पर बिखरते नहीं। इस हादसे ने हमें रुलाया जरूर, पर साथ ही सिखाया भी अब और लापरवाही की गुंजाइश नहीं।
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