धराली त्रासदी की दिल दहला देने वाली कहानी

उत्तराखंड के धराली गांव में 5 अगस्त की दोपहर 1:45 बजे जो हुआ, वो सिर्फ एक हादसा नहीं था — वो कुदरत की क्रूरता और इंसानी लाचारगी की जिंदा तस्वीर बन गया। खीर गंगा नदी में अचानक आया सैलाब, फिर मलबे की बाढ़… और महज़ 34 सेकंड में एक पूरा गांव मिट्टी में दफन हो गया। आज 64 घंटे बीत चुके हैं। धराली के लोग अब भी मलबे के नीचे दबी सांसों की आस लगाए बैठे हैं। और बचाव? वो भटवाड़ी में अटका है — ठीक 60 किलोमीटर दूर।
माँ अब भी अंदर है… बची हुई बेटी की आवाज़
शिवानी (13), जो किसी तरह मलबे से बाहर निकाली गई, अब भी अपनी माँ की आवाज़ सुनने को तड़प रही है।
मैं चिल्लाती रही, लेकिन माँ की आवाज़ नहीं आई… शायद वो अब भी जिंदा हो, वहीं कहीं नीचे…
लेकिन सच्चाई ये है कि उस मलबे में सिर्फ 3 जेसीबी हैं — और 80 एकड़ में फैले 20 से 50 फीट ऊँचे मलबे को हटाने में ये महीनों लग जाएँ तो हैरानी नहीं।

सड़कें टूटीं, पुल बहे… इंसानियत की राह भी बंद?
धराली तक पहुंचने वाला हर रास्ता तबाह है। 4 जगह सड़कें 150 मीटर तक बह चुकी हैं। एक छोटा पुल टूट गया है जिसे शुक्रवार तक बनाने का दावा किया जा रहा है। बड़ी मशीनें और थर्मल सेंसिंग उपकरण भटवाड़ी में रुके हैं, क्योंकि रास्ता ही नहीं है।
क्या ऐसा हो सकता है कि हम चाँद पर पहुँच जाएँ लेकिन धरती के किसी गांव में मदद 4 दिन में भी न पहुँच पाए?
हेलीकॉप्टर, लेकिन किसके लिए?
हर्षिल और गंगोत्री के बीच 307 पर्यटकों को एयरलिफ्ट किया गया जो बेहद ज़रूरी भी था। लेकिन धराली के वे स्थानीय लोग, जिनके घर, खेत, परिवार सब मिट्टी में समा गए उन्हें अब भी इंतज़ार है। 250 से 300 सैनिक जुटे हैं, मगर बिना मशीनों के, उनकी मजबूरी भी अब साफ दिखती है।
कैप्टन गुरप्रीत सिंह कहते हैं,
“हम यहां हैं, पर मशीनें नहीं हैं। उम्मीद है कि एक हफ्ते में हर व्यक्ति तक पहुँच जाएं…”
लेकिन क्या मलबे के नीचे दबी साँसें एक हफ्ता और टिक पाएंगी?
महाराष्ट्र के 151 टूरिस्ट फंसे, 31 का कोई सुराग नहीं
महाराष्ट्र से आए 151 पर्यटकों में से 31 की जानकारी अब तक नहीं मिल पाई है। ये लोग मुंबई, ठाणे, नासिक, मालेगांव जैसे शहरों से थे जो शायद बस एक शांत हिमालयन यात्रा पर निकले थे। अब परिजन टीवी से चिपके हैं, हर फ़ोन कॉल में एक राहत की खबर की उम्मीद लिए।
सरकार ने यात्रा रोकी, पर धराली की रफ्तार अब भी धीमी
बद्रीनाथ और केदारनाथ यात्राएँ रोकी गईं ये समझदारी भरा कदम है। लेकिन धराली की तरफ बचाव और राहत की रफ्तार अब भी कछुए जैसी है।

क्या ये सिर्फ एक हादसा है या एक चेतावनी?
धराली की त्रासदी सिर्फ मलबे और मौतों की कहानी नहीं है ये उस नकली विकास की भी पोल खोलती है, जो हमें कंक्रीट के सपनों में उलझा कर इंसानियत से दूर कर रहा है। जब तकनीक सबकुछ हो, तो एक गांव तक मदद पहुँचने में 4 दिन क्यों लगते हैं? जब मौसम विभाग चेतावनी देता है, तो सिस्टम क्यों नहीं सुनता? और जब सब कुछ खत्म हो जाता है, तो कंधे पर सिर रखने को बस मीडिया की हेडलाइन ही क्यों बचती है?
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