प्राकृतिक नहीं, अनदेखी से आई तबाही थी
धराली गांव… उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसा एक शांत, धार्मिक, और पर्यटकों का प्रिय पड़ाव। लेकिन 6 अगस्त 2025 की दोपहर 1:45 बजे, ये गांव सिर्फ़ एक भूगोल नहीं रहा — एक दुःस्वप्न बन गया। सिर्फ़ 34 सेकेंड। इतनी देर में धरती कांपी, पहाड़ फटा, और गांव बह गया। 4 लोग मारे गए, 50 से ज्यादा लापता, और एक पूरा गांव ध्वस्त।

धरती की दरारों में दबा जलजला
धराली सिर्फ हिमालय में नहीं, “मेन सेंट्रल थ्रस्ट” यानी एक सक्रिय भूकंपीय दरार पर बसा है। वैज्ञानिक प्रोफेसर एसपी सती पहले ही चेतावनी दे चुके थे — यह इलाका ‘टाइम बम’ है। लेकिन चेतावनियाँ कागज़ों में गुम हो गईं, और धराली के लोग अब मलबे में। ये पहली बार नहीं है जब ये गांव तबाह हुआ हो।
1864, 2013, 2014… हर बार प्रकृति पुकारती रही, और हमने सुनने से इनकार किया।
34 सेकेंड में छीन ली ज़िंदगियाँ
खीरगंगा नदी उफान पर थी, बारिश दो दिन से थमी नहीं थी। और फिर, जैसे किसी ने स्विच दबा दिया हो — बादल फटा, मलबा आया, और पूरा बाजार, होटल, मकान, सेना का कैंप… सब कुछ बह गया। लोग भागने की कोशिश करते रहे, लेकिन पानी और मलबे ने रास्ता नहीं छोड़ा। कुछ लोग अपने घरों में ही थे, कुछ दुकान पर। किसी के पास सोचने का समय भी नहीं था।

एक चश्मदीद ने कहा,
“मैं खिड़की से बाहर देख ही रहा था, तभी सब कुछ धुंध में छिप गया। 30 फीट ऊंचा मलबा हमारे घर को निगल गया।”
1500 साल पुराना मंदिर, अब इतिहास बन गया
जो बात दिल को सबसे ज़्यादा चीरती है, वो है कल्पकेदार महादेव मंदिर की तबाही। भागीरथी किनारे स्थित ये मंदिर पंच केदार परंपरा का हिस्सा था। हज़ारों भक्तों की आस्था और इतिहास एक झटके में मिट्टी में मिल गया। ये सिर्फ एक मंदिर नहीं था, ये लोगों की पहचान थी। और अब, वो पहचान भी लापता है।
सेना भी नहीं बच सकी
हर्षिल क्षेत्र में भी बादल फटा। भारतीय सेना के 8 से 10 जवान लापता हैं। ये वही जवान हैं जो सर्दियों में बर्फ में डटे रहते हैं, हमारी रक्षा करते हैं। और अब… वो भी इसी मलबे में कहीं दबे हैं।
राहत कार्य जारी, लेकिन सवाल वहीं हैं

SDRF, NDRF, ITBP, और आर्मी की टीमें लगातार बचाव में जुटी हैं। 130 से ज़्यादा लोगों को निकाला गया, लेकिन कई परिवार अब भी अपनों का नाम पुकार रहे हैं, उम्मीद की एक किरण ढूंढ़ते हुए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हवाई सर्वेक्षण किया, पर लोग कह रहे हैं —
“अब क्या फायदा, जब सब कुछ लुट गया?”
कब सुधरेंगे हम?
धराली की त्रासदी सिर्फ बादल फटने की नहीं है। ये उस लापरवाह विकास, चेतावनियों की अनदेखी, और प्रकृति से खिलवाड़ की कहानी है, जिसकी कीमत इंसानों ने अपने लहू से चुकाई है। जब तक हम हिमालय को सिर्फ़ “पर्यटन स्थल” और “कमाई का ज़रिया” समझते रहेंगे, धराली जैसे गांव हर साल मिटते रहेंगे।

