हर्षिल में झील, धराली में मातम, रडार से तलाशे जा रहे लोग
5 अगस्त की दोपहर 1:45 बजे उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में जैसे कयामत उतर आई। आसमान फटा, और ज़मीन दरक गई। बस 34 सेकंड। और एक पूरा गांव मलबे में दब गया।

बादल फटा था हर्षिल में। मगर असर सिर्फ वहां नहीं रुका। खीर गंगा नदी ने रफ्तार पकड़ी और जो रास्ते में था, उसे बहा ले गई। सेना का कैंप टूट गया, सड़कें उखड़ गईं, और धराली में इंसानी जिंदगी चुपचाप मलबे के नीचे दब गई।
वो मां जो अब भी अपनी बेटी की चप्पल खोज रही है…
तीन दिन बाद जब बचाव दल मलबे के पास पहुंचा, एक औरत रोती मिली। उसने बस इतना कहा “मेरी छोटी की चप्पल यहीं कहीं थी… शायद वो अंदर है…”
उसकी आंखों में वो तस्वीर अब भी बसी थी जब बारिश तेज हुई, और बच्ची बाहर भागने की कोशिश में दरवाजे तक भी नहीं पहुंच पाई। ऐसे दृश्य कैमरों में नहीं कैद होते। ये दिलों में घुलते हैं। यही है उत्तराखंड की इस प्राकृतिक आपदा की सबसे भयावह सच्चाई।
उम्मीद की किरण: रडार से जिंदगी की तलाश
सेना अब एडवांस पेनिट्रेटिंग रडार का इस्तेमाल कर रही है। बिना खुदाई किए, ज़मीन के 20 से 30 फीट नीचे दबी हड्डियों और धातु जैसी चीज़ों को ये रडार ढूंढ सकता है। शायद कोई सांसें अब भी बाकी हों। शायद कोई बच जाए।

लेकिन 80 एकड़ में फैले मलबे में केवल 3 JCB मशीनें लगी हैं। बड़ी मशीनें और थर्मल उपकरण 60 किमी दूर भटवाड़ी में फंसे हैं, क्योंकि रास्ता ही टूटा पड़ा है।
रेस्क्यू जारी, पर वक्त भी कम है
650 टूरिस्ट और श्रद्धालुओं को रेस्क्यू किया जा चुका है, हेलिकॉप्टर अब भी उड़ रहे हैं। मोबाइल नेटवर्क तीन दिन बाद लौटा है। बिजली नहीं है, और कई गांव अब भी काट दिए गए हैं दुनिया से। गंगोत्री जाने वाली एकमात्र सड़क धराली से गुजरती है, और वो सड़क अब 4 जगहों पर ही नहीं लोगों के दिलों में भी टूट गई है।
कहां हैं सवाल, और कौन देगा जवाब?
क्या ये सिर्फ कुदरत का कहर था? या फिर लापरवाह निर्माण, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और अनदेखा किया गया अलर्ट? यह सवाल बाद में पूछे जाएंगे। अभी, उन बच्चों को ढूंढना है जो मलबे में दबे हैं। उन माँओं को ढूंढना है जो अब भी पुकार रही हैं मोनू… आवाज दे बेटा…”
पहाड़ अब भी इंतजार में हैं…
उत्तराखंड के ये पहाड़ बहुत कुछ सहते हैं धूप, बर्फ, बारिश और अब ये तांडव। मगर यहां के लोग हर बार फिर उठ खड़े होते हैं।इस बार फर्क बस इतना है कि कुछ चेहरे शायद लौटें ही नहीं। पर उनकी यादें, उनकी कहानियां, और उनकी अधूरी चीखें अब इन वादियों में हमेशा के लिए गूंजेंगी।

क्या आप कर सकते हैं कुछ?
शायद हां। जागरूकता, समर्थन, और सिस्टम से जवाब मांगना भी मदद होती है। अभी राहत फंड में योगदान करें, वॉलंटियर्स को सपोर्ट करें, और सबसे जरूरी इन कहानियों को अनसुना मत जाने दें।
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