राजनीति में कई बयान सिर्फ शब्द नहीं होतेवे किसी देश की नियति बदल सकते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प और व्लादिमीर पुतिन की संभावित मुलाक़ात भी कुछ ऐसी ही है। एक ओर युद्ध की आँच में जलता यूक्रेन, दूसरी ओर दुनिया की निगाहें टिकी हैं अलास्का की बर्फीली ज़मीन पर, जहां 15 अगस्त को दोनों नेताओं के बीच सीधी बातचीत होगी। पर ट्रम्प के हालिया बयानों ने इस मुलाक़ात से पहले ही हलचल मचा दी है। उन्होंने साफ शब्दों में पुतिन को चेताया“अगर अब भी युद्ध नहीं रुका, तो गंभीर नतीजे भुगतने होंगे।”
मुलाकात से पहले ट्रम्प का अल्टीमेटम
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अब एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में हैं।
बुधवार की प्रेस ब्रीफिंग में उन्होंने जो कहा, वो सिर्फ एक कूटनीतिक बयान नहीं थावो एक चेतावनी थी, पुतिन के लिए, और शायद दुनिया के लिए भी।
“अगर पुतिन बातचीत के बाद भी युद्ध खत्म नहीं करते हैं, तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।”
डोनाल्ड ट्रम्प
ट्रम्प और पुतिन की यह मुलाक़ात ऐसे समय हो रही है जब यूक्रेन युद्ध को साढ़े तीन साल हो चुके हैं और लाखों लोग विस्थापित, घायल या मारे जा चुके हैं। 2018 की हेलिंस्की मीटिंग के बाद यह पहली बार है जब दोनों आमने-सामने बैठने वाले हैंइस बार अमेरिका की जमीन पर।
यूक्रेन का डर: क्या ज़मीन सौदे की तैयारी हो रही है?
इस मुलाक़ात से पहले ट्रम्प ने यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और यूरोपीय नेताओं के साथ वर्चुअल बैठक की। उन्होंने संकेत दिया कि शांति के बदले कुछ ज़मीन की अदला-बदली हो सकती है।
लेकिन जेलेंस्की ने दो टूक जवाब दिया
“यूक्रेन की ज़मीन पर कोई समझौता नहीं होगा। पहले युद्धविराम हो, फिर सुरक्षा की गारंटी।”
वोलोदिमिर जेलेंस्की
जेलेंस्की ने स्पष्ट किया कि डोनबास या किसी और क्षेत्र को रूस के हाथों सौंपने का सवाल ही नहीं उठता। उनका मानना है कि पुतिन की मंशा केवल युद्धविराम नहीं, कब्ज़ा है।
यूरोप में बेचैनी: ट्रम्प-पुतिन सौदा यूक्रेन को कमजोर कर देगा?
फ्रांस, ब्रिटेन, पोलैंड, फिनलैंड, और नाटो महासचिव मार्क रूट समेत कई यूरोपीय नेता इस मीटिंग को लेकर चिंतित हैं। उन्हें डर है कि ट्रम्प और पुतिन के बीच कोई “बैकडोर डील” हो सकती है, जिससे रूस को यूक्रेन का एक बड़ा हिस्सा मिल जाए। इसका मतलब होगायूक्रेन की संप्रभुता पर समझौता, अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी, और रूस की आक्रामकता को इनाम देना।
फरवरी 2025 तक की स्थिति
अब तक, रूस यूक्रेन के पूर्वी और दक्षिणी इलाकों में कब्ज़ा जमाए हुए है। युद्ध विराम नहीं होने से हालात और खराब हो रहे हैं। दोनों देशों की सेनाएं थकी हुई हैं, लेकिन पीछे हटने को कोई तैयार नहीं।
क्या ये बातचीत शांति ला सकती है?
ट्रम्प के तेवर यह संकेत देते हैं कि वे एक ‘डीलमेकर’ के तौर पर वापसी करना चाहते हैं।
पर सवाल ये है कि क्या पुतिन, जो अब तक किसी भी दबाव में नहीं झुके, वाकई इस बातचीत में कोई ठोस कदम उठाएंगे?
या यह बैठक भी महज़ फोटो ऑप बनकर रह जाएगी?
युद्ध से ज़्यादा ज़रूरी है भरोसा लेकिन किस पर?
युद्ध की सबसे बड़ी कीमत हमेशा आम लोगों को चुकानी पड़ती हैचाहे वो कीव के बच्चे हों या डोनबास की माँएं।आज जब दुनिया एक बार फिर दो ताक़तवर नेताओं की बातचीत की तरफ देख रही है, असली सवाल यह है क्या यह मुलाक़ात वाकई शांति लाएगी? या फिर एक नए और खतरनाक अध्याय की शुरुआत करेगी?
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