ट्रम्प के नाम पर बनेगा ‘शांति रूट’, दो दुश्मन देश दोस्त बन गए

कभी सोचा है, किसी एक फैसले से इतिहास की दिशा बदल सकती है? और वो भी ऐसे दो देशों के बीच, जो तीन दशक से भी ज़्यादा वक्त से एक दूसरे की जमीन, धर्म और पहचान को लेकर युद्ध लड़ते आ रहे थे।
लेकिन अब, जहां गोलियां चलती थीं, वहां जल्द ही ट्रेन दौड़ेगी। तेल बहेगा, इंटरनेट की लाइन बिछेगी, और सबसे अहम दो देशों की उम्मीदें जुड़ेंगी। और इस रास्ते का नाम होगा – “ट्रम्प रूट फॉर इंटरनेशनल पीस एंड प्रॉस्पेरिटी”।
एक तस्वीर, जिसमें कोई गोली नहीं थी… सिर्फ कलम चली
अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव और आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिन्यान ने, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मौजूदगी में वो समझौता किया, जिसकी उम्मीद भी अब तक असंभव मानी जाती थी।
शुक्रवार को ट्रम्प के साथ हुए इस ऐतिहासिक समझौते में फैसला हुआ कि विवादित ज़मीन पर एक ट्रांजिट कॉरिडोर बनेगा जो अजरबैजान को उसके अलग थलग पड़े नखचिवान एंक्लेव से जोड़ेगा। और यह रास्ता आर्मेनिया से होकर गुजरेगा।
ट्रम्प रूट: सिर्फ रास्ता नहीं, एक राजनीतिक प्रतीक
इसे नाम मिला Trump Route for International Peace and Prosperity। ये सिर्फ एक गलियारा नहीं है, ये उस कड़वाहट के बीच का पुल है जो कभी बमों, नफरत और अस्थिरता से भरा था। अब यहां तेल गैस की पाइपलाइन, रेल कनेक्शन और फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क बिछाने की योजना है।

यानी जहां बंदूकें थीं, वहां अब तकनीक और तरक्की चलेगी।
नोबेल की गूंज?
दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से ट्रम्प को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने की मांग की। शायद ये राजनीति का हिस्सा हो लेकिन कोई भी यह नकार नहीं सकता कि ट्रम्प की टीम ने एक लंबे समय से ठहरे हुए मुद्दे को हिलाकर रख दिया।
ट्रम्प ने इस मौके पर एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच भी तनाव कम कराया था।
थोड़ा पीछे चलते हैं यह विवाद शुरू कैसे हुआ था?
यह कहानी 1988 से शुरू होती है जब सोवियत संघ के कमजोर पड़ते शासन के दौरान नागोर्नो काराबाख की संसद ने खुद को आर्मेनिया के साथ जोड़ने का फैसला किया। यह क्षेत्र अजरबैजान के नक्शे में आता था, लेकिन आबादी बहुसंख्यक आर्मेनियाई थी।
इसके बाद धार्मिक और सांस्कृतिक संघर्ष, जातीय हिंसा, और अंततः 1991 से खूनी युद्ध का दौर चला।
- आर्मेनियाई ईसाई हैं
- अजरबैजानी मुस्लिम और तुर्किक मूल के
तो क्या अब वाकई शांति आ गई है?
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। समझौते पर हस्ताक्षर कर देना और ज़मीनी स्तर पर भरोसा बनना दोनों में बहुत अंतर होता है। लेकिन यह पहला मौका है जब ओएससीई मिन्स्क ग्रुप, जो दशकों से इस विवाद का मध्यस्थ रहा है, को दोनों पक्षों ने मिलकर भंग करने की मांग की है। यानी अब दोनों देश सीधे एक दूसरे से बात करने को तैयार हैं यह एक बड़ी जीत है।
जब रास्ते खुलते हैं, दिल भी खुलते हैं
शायद “ट्रम्प रूट” आने वाले सालों में सिर्फ एक कॉरिडोर न रह जाए बल्कि वो पलटाव का प्रतीक बन जाए, जो दुनिया को याद दिलाए कि जहां रगों में नफरत दौड़ रही हो, वहां भी संवाद की नसें बहाल की जा सकती हैं। हो सकता है किसी दिन एक आर्मेनियाई किसान और एक अजरबैजानी ड्राइवर एक ही चाय दुकान पर बैठें, और ये भूल जाएं कि कभी उनके देशों के बीच गोलियां चलती थीं।
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