भारत की राजनीति में तहलका मचाने वाले एक नए मोड़ पर हम खड़े हैं – भाजपा ने दो दिग्गज नेताओं, ठाकुरचंद गहलोत और ओम माथुर, को उपराष्ट्रपति पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में आगे रखा है। इस कदम से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। आइए विस्तार से जानें– क्यों ये निर्णय हुआ, इनका राजनीतिक सफर क्या रहा, और आगे क्या हो सकता है।
ठाकुरचंद गहलोत – दलित मोर्चे का प्रतिष्ठित चेहरा
पूर्व केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य और RSS से जुड़े वरिष्ठ नेता, 73‑साल के गहलोत ने राजभवन कर्नाटक (2021) जैसी प्रतिष्ठित जिम्मेदारियाँ निभाईं, दलित समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ और पार्टी के अंतरिम निर्णय‑मंडल में उनकी उपस्थिति रणनीति को और धार देती है।
ओम माथुर – संगठनबद्ध शक्ति का पर्याय
राजस्थान के संगठन प्रभारी, दो बार राज्यसभा सांसद और BJP के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे, RSS प्रवक्ता से केंद्र‑राजस्थान‑छत्तीसगढ़‑मध्यप्रदेश तक चुनावों में अहम भूमिका निभाई. साधारण जीवन‑शैली और जमीन से लगाव की वजह से कार्यकर्ताओं में उनका खास स्थान रहा।
निर्णय का राजनीतिक आउटकम
- भाजपा की नई रणनीति: दलित और संगठन‑नेताओं को लेकर जनादेश को मजबूत करना
- राजस्थान के समीकरण: गहलोत‑माथुर के नाम से राज्य में भाजपा की मजबूती और चेतना बढ़ेगी
- केंद्र में संतुलन: इन दोनों नामों से विपक्ष पर दबाव और BJP के दलित नेताओं को एजेंडा सेट करने का मौका
विरोध‑प्रतिक्रिया और मुकाबला
विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस में सवाल उठ रहे हैं – क्या ये सिर्फ शोपीस नाम हैं?
राज्यसभा की वर्तमान स्थिति को देखते हुए, BJP को एक प्रभावी उम्मीदवार चुनने की ज़रूरत है।
ठाकुरचंद गहलोत और ओम माथुर को नामित करके भाजपा ने उपराष्ट्रपति पद की लड़ाई में एक नया राज्य‑राजनीतिक रणक्षेत्र तैयार किया है। यह कदम पार्टी के दलित वर्ग और संगठन‑क्षम नेतृत्व के बीच संतुलन सिद्ध करता है। वहीं विपक्ष कटु आलोचना करने से नहीं चूक रहा। आने वाले हफ्तों में प्रचार‑रणनीति, समर्थन की मैकेनिक्स और विपक्षी गठजोड़ से इस राजनीति के अगले मोड़ पर देश की नज़र रहेगी।
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