तेजस्वी यादव का चुनावी वादा: संविदा कर्मियों को मिलेगी स्थायी नौकरी, हर परिवार को सरकारी रोजगार का आश्वासन
बिहार में संविदा कर्मियों की उम्मीदें हुईं मजबूत
तेजस्वी यादव का चुनावी वादा: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राघोपुर से आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का बड़ा ऐलान राजनीति में नई हलचल ला गया है। वर्षों से अस्थायी रूप से कार्य कर रहे राज्य के संविदा कर्मियों को अब स्थाई नौकरी का सपना दिखाते हुए तेजस्वी ने वादा किया है कि सरकार बनते ही सभी संविदा कर्मचारियों को स्थायी किया जाएगा।
उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका यह वादा सिर्फ घोषणा नहीं, बल्कि संविदा कर्मियों के सम्मान और सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम होगा।
“संविदा कर्मियों के साथ हो रहा शोषण अब नहीं चलेगा”
तेजस्वी यादव का चुनावी वादा: पटना में आयोजित एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि संविदा पर काम कर रहे हजारों शिक्षकों, स्वास्थ्यकर्मियों, तकनीकी सहायकों और डेटा एंट्री ऑपरेटरों की हालत बेहद दयनीय है।
उन्होंने कहा,
“आज भी इन कर्मियों से लंबा काम लिया जाता है, लेकिन उन्हें स्थायी कर्मचारियों जैसा वेतन और अधिकार नहीं दिया जाता। उनके वेतन से टैक्स काट लिया जाता है, जो नाइंसाफी है। अब इस अन्याय का अंत होगा।”
तेजस्वी ने साफ किया कि उनकी पार्टी सत्ता में आने के बाद सबसे पहले संविदा व्यवस्था खत्म करेगी और इन कर्मियों को वह सारे लाभ देगी जो एक स्थायी सरकारी कर्मचारी को मिलते हैं।
मानसिक और आर्थिक सुरक्षा की गारंटी
राजद नेता ने संविदा प्रणाली को “शोषण की व्यवस्था” करार देते हुए कहा कि अब बदलाव का समय आ गया है। उन्होंने कहा, “हम संविदा कर्मियों को स्थायित्व देंगे ताकि वे मानसिक और आर्थिक दोनों रूप से सुरक्षित महसूस करें।”
राज्यभर में इस घोषणा के बाद संविदा कर्मियों में उत्साह की लहर फैल गई है। कई शिक्षकों और स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि यह घोषणा उनके संघर्ष की जीत है। भले ही पिछली कई सरकारों ने वादे किए, लेकिन किसी ने इसे अमल में नहीं लाया।
तीन बड़ी घोषणाओं ने बढ़ाई सियासी गर्मी: तेजस्वी यादव का चुनावी वादा
प्रेस कॉन्फ्रेंस में तेजस्वी यादव ने तीन बड़े वादे किए —
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जीविका दीदियों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा और न्यूनतम वेतन 10,000 से बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह।
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सभी संविदा कर्मियों को स्थायी करने का संकल्प।
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हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा।
विपक्ष जहां इसे चुनावी जुमला बता रहा है, वहीं आरजेडी समर्थक इसे बिहार की राजनीति में “रोजगार क्रांति” कह रहे हैं। अब यह जनता पर निर्भर करेगा कि वे इस वादे पर भरोसा जताते हैं या नहीं।
