नेशन मिरर से सिद्धार्थ दुबे की रिपोर्ट
सागर जिले के दक्षिण वन मंडल के अंतर्गत ढाना रेंज के जामघाट और बरोदा व्रत क्षेत्र में इन दिनों सागौन की अवैध तस्करी को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। सागौन माफिया इतने बेखौफ हैं कि वे रातों रात बैलगाड़ी से सागौन की तस्करी कर रहे हैं। इन तस्करों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे दिन में भी तस्करी करते हैं और इस दौरान बीट गार्ड अपनी चौकी में नज़र नहीं आते। यह स्थिति यह दर्शाती है कि वन विभाग के कर्मियों का इस गंभीर समस्या पर नियंत्रण नहीं है, जिससे तस्करों का मनोबल और बढ़ रहा है।
अद्भुत यह है कि तस्करी में लिप्त बैलगाड़ी से सागौन का परिवहन करने वाले तस्कर किसी न किसी अधिकारी या बीट गार्ड की कृपा के बिना इस अवैध गतिविधि को अंजाम नहीं दे सकते। यह सवाल उठता है कि क्या सागौन माफिया को वन विभाग के अधिकारियों का समर्थन प्राप्त है या यह माफिया अपनी गतिविधियों को अधिकारियों की नज़र से बचाकर अंजाम दे रहे हैं। यह सब ऐसे समय हो रहा है जब सरकार सागौन सहित अन्य बेशकीमती वृक्षों की अवैध कटाई और तस्करी को रोकने के लिए लगातार योजनाएं बना रही है और विभागीय स्तर पर करोड़ों रुपये का बजट आवंटित कर रही है।
हमने जब इस पूरे मामले पर ढाना रेंजर से जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया, तो रेंजर साहब विभागीय कार्यों में इतने व्यस्त थे कि आधे घंटे तक उनके पास रहकर भी कोई ठोस जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी। इसके बाद हमने सागर डीएफओ से मुलाकात करने का प्रयास किया, लेकिन वे भी अपनी मीटिंग में व्यस्त थे। यह स्थिति इस बात को उजागर करती है कि विभागीय अधिकारियों का ध्यान इस गंभीर मुद्दे की ओर नहीं है, और उनका ध्यान पूरी तरह से कार्यों में व्यस्त है।
सरकार द्वारा जंगलों की रक्षा के लिए सैकड़ों योजनाएं बनाई जा रही हैं, लेकिन इन योजनाओं का जमीन पर क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। अगर तस्करी की यही स्थिति रही, तो यह जंगल जल्द ही वीरान हो जाएंगे और इन बेशकीमती पेड़ों की अवैध कटाई और तस्करी का सिलसिला जारी रहेगा। यह केवल वन विभाग की लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि यह सरकार की नाकामी को भी दर्शाता है।
सागर जिले में सागौन की अवैध तस्करी एक गंभीर मामला बन चुका है। इसके बावजूद, विभागीय अधिकारी इस मुद्दे पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं। इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब वन विभाग और सरकार दोनों मिलकर इस तस्करी पर कड़ा शिकंजा कसें और सख्त कानूनों का पालन सुनिश्चित करें। इसके साथ ही, तस्करों के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए वनकर्मियों को जागरूक करना और उन्हें जिम्मेदार ठहराना भी आवश्यक है।
अगर यह स्थिति जस की तस बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब जंगलों के भीतर बेशकीमती वृक्ष खत्म हो जाएंगे और प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा। अब देखना यह है कि क्या सरकार और वन विभाग इस पर ध्यान देंगे और इस तस्करी को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएंगे, या फिर यह जंगल और उसकी संपत्ति ऐसे ही तस्करों के हवाले हो जाएगी।
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