Supreme Court का आदेश: दिल्ली NCR से आवारा कुत्ते हटें?
क्या आपने कभी किसी मासूम कुत्ते को रोटी के लिए एक बच्चे की तरह लड़ते देखा है? क्या कभी किसी बारिश में भीगते, कांपते हुए जानवर को देखकर आपका दिल पसीजा है? दिल्ली NCR की सड़कों पर रहने वाले ये आवारा कुत्ते सिर्फ जानवर नहीं हैं, ये भी हमारी तरह इस शहर का हिस्सा हैंभूख, डर, और ठंड से लड़ते हुए।
लेकिन अब एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ हैक्या इन बेजुबानों को जबरन शेल्टर होम में भेज देना ही हल है? या फिर ये एक मानवीय त्रासदी की शुरुआत?

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और बढ़ता विवाद
11 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिकbut बेहद संवेदनशीलआदेश दिया आठ हफ्तों में दिल्ली NCR की सड़कों से सभी आवारा कुत्तों को हटाकर शेल्टर होम में भेजा जाए। इस आदेश के पीछे सोच हैडॉग बाइट्स और रेबीज के बढ़ते मामलों से लोगों की सुरक्षा करना। आंकड़ों की मानें तो 2024 में 37 लाख से ज्यादा डॉग बाइट हुए और 54 मौतें रेबीज से। लेकिन सवाल ये हैक्या समाधान यही है? क्या कुत्तों को हटाना ही हमारी सुरक्षा का इकलौता रास्ता है?
कहानी के दो पहलू: इंसान और जानवर दोनों की पीड़ा
एक माँ की दर्दनाक कहानी
छह साल की बच्ची छवि शर्मा को दिल्ली में एक कुत्ते ने काट लिया था। इलाज के बावजूद उसकी मौत हो गई। माता पिता का रो रोकर बुरा हाल। उनके लिए ये फैसला देर से सही, लेकिन राहत देने वाला है।
एक डॉग लवर की पीड़ा
वहीं दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के बाहर वकीलों और डॉग लवर्स के बीच भिड़ंत का वीडियो वायरल हुआ। जो लोग इन जानवरों को रोज खाना खिलाते हैं, उनके लिए ये आदेश जैसे किसी अपने को खो देने जैसा है।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
💬 राहुल गांधी का बयान
“ये फैसला हमारी वर्षों की मानवीय नीति को पीछे ले जाता है। कुत्ते कोई ‘समस्या’ नहीं हैं।”
💬 प्रियंका गांधी
“कुत्ते सबसे कोमल प्राणी हैं। शेल्टर होम भेजने का फैसला क्रूर है।”
💬 मेनका गांधी
“दिल्ली में तीन लाख कुत्ते हैं। उन्हें रखने के लिए हजारों शेल्टर होम की जरूरत पड़ेगी। ये असंभव है।”
💬 शशि थरूर का सुझाव
“फंड सीधे उन NGO को दें जो अनुभव रखते हैं। स्थानीय निकाय कई बार पैसा भी सही से खर्च नहीं करते।”
शेल्टर होम की सच्चाई
सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि कुत्तों को शेल्टर होम में रखा जाएbut कौन से शेल्टर होम? दिल्ली के मौजूदा शेल्टर पहले ही ओवरलोड हैं। वहां ना खाने की सही व्यवस्था है, ना दवाइयों की, और ना ही मानवीय देखभाल की। किसी को एक छोटे से पिंजरे में बंद करना… क्या ये समाधान है या सजा?
संवेदनशील हल की तलाश
समस्या का हल न तो कुत्तों को जबरन हटाना है और न ही आंख मूंद लेना। नसबंदी और टीकाकरण का काम तेज किया जाए, नगर निगम को जवाबदेह बनाया जाए अनुभवी NGOs के साथ मिलकर काम हो जनजागरूकता फैलाई जाए ताकि लोग कुत्तों को दुश्मन ना समझें इंसानों की सुरक्षा के साथ साथ जानवरों की गरिमा भी बनी रहे
