तमिलनाडु सरकार को मिली सुप्रीम कोर्ट से बड़ी फटकार
tamilnadu supreme court: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को तमिलनाडु सरकार को एक गंभीर और कठोर संदेश देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की मूर्ति लगाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम को खारिज कर दिया। इस फैसले ने सरकार की योजनाओं पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, जो कहता है— क्या नेताओं के महिमामंडन के लिए सार्वजनिक पैसे का इस्तेमाल करना उचित है?

आखिर क्यों एक राज्य सरकार, जो जनता की भलाई के लिए काम करने का वादा करती है, सार्वजनिक धन का उपयोग सिर्फ मूर्तियों के महिमामंडन के लिए करना चाहती है? क्या जनता का पैसा ऐसे खर्च किया जाना चाहिए?
क्या था पूरा मामला?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि का 2018 में निधन हो गया था, लेकिन उनकी मूर्ति बनाने की मांग अभी भी जारी है। राज्य सरकार ने प्रस्ताव रखा था कि तिरुनेलवेली में मुख्य सड़क पर, वल्लियूर डेली वेजिटेबल मार्केट के एंट्री गेट पर करुणानिधि की कांस्य मूर्ति और उनका नाम बोर्ड स्थापित किया जाए।
यह याचिका मद्रास हाईकोर्ट में पहले ही खारिज हो चुकी थी।
अदालत ने यह कहते हुए मूर्ति लगाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया था कि सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियां लगाना ट्रैफिक जाम का कारण बन सकता है और इससे जनता को असुविधा होती है।
अब जब तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की,
तो न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने साफ शब्दों में कहा कि जनता के पैसों से नेताओं की मूर्तियों का महिमामंडन नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा,
“क्या आप जनता के पैसे का इस्तेमाल अपने नेताओं के महिमामंडन के लिए करना चाहते हैं?” कोर्ट ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और राज्य सरकार को याचिका वापस लेने को कहा। इसके साथ ही अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियां लगाने पर रोक लगी थी।
क्या यह फैसला तमिलनाडु सरकार के लिए एक बड़ा झटका है?
बिल्कुल! जब सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था इस तरह का फैसला देती है, तो यह एक स्पष्ट संदेश भेजता है कि राज्य के संसाधनों का उपयोग सिर्फ व्यक्तिगत महिमामंडन के लिए नहीं किया जा सकता।
नेताओं की मूर्तियां युवाओं के लिए नहीं, लीडर्स पार्क बनाएं!
मद्रास हाईकोर्ट ने भी मूर्तियां लगाने के खिलाफ अपना पक्ष स्पष्ट किया था। अदालत ने कहा था कि सार्वजनिक स्थानों पर नेताओं की मूर्तियां लगाने से अक्सर ट्रैफिक जाम होता है और नागरिकों को असुविधा होती है। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया था कि सरकार को लीडर्स पार्क बनाने पर विचार करना चाहिए।
लीडर्स पार्क युवाओं के लिए बहुत फायदेमंद हो सकते हैं, क्योंकि इससे उन्हें नेताओं की विचारधाराओं को समझने का मौका मिलेगा और वे खुद के लिए एक बेहतर रास्ता चुन सकते हैं।
तमिलनाडु सरकार की निरंतर कोशिशें और अदालत का रुख
राज्य सरकार ने इसके पहले भी तमाम मूर्तियां स्थापित करने की कोशिशें की हैं। 2022 में तिरुवन्नामलाई में गिरिवलम इलाके में करुणानिधि की मूर्ति स्थापित करने की कोशिश को भी मद्रास हाईकोर्ट ने रोक दिया था। इसके अलावा, चेन्नई के ओमंदुरार एस्टेट और सलेम के अन्ना पार्क में भी करुणानिधि की मूर्तियां स्थापित की गई थीं, जिनकी ऊंचाई 16 फीट तक है।

हालांकि, राज्य सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती बन चुकी है क्योंकि अदालतें बार-बार यह कह रही हैं कि नेताओं के महिमामंडन के लिए सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल उचित नहीं है।
क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा?
इस फैसले से तमिलनाडु सरकार को यह समझने का मौका मिलेगा कि राजनीतिक दलों के लिए सिर्फ राजनीतिक नफे-नुकसान से ज्यादा महत्वपूर्ण है जनता के हक का ध्यान रखना। अगर राज्य सरकार वास्तव में विकास और कल्याण की दिशा में कुछ करना चाहती है, तो उसे यह समझना होगा कि सार्वजनिक धन का उपयोग नागरिकों की भलाई के लिए होना चाहिए, न कि नेताओं की छवि चमकाने के लिए।
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