supreme court judicial exam : जज बनने के लिए अब जरूरी है 3 साल अनुभव
supreme court judicial exam : नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि अब फ्रेश लॉ ग्रेजुएट्स न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल नहीं हो सकते। उन्हें कम से कम तीन साल का अधिवक्ता के रूप में कोर्ट का अनुभव होना अनिवार्य होगा।
यह फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनाया, जो ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर आधारित था।
📜 फैसले के मुख्य बिंदु:
- न्यायिक सेवा परीक्षा (Judicial Services Exam) में बैठने के लिए कम से कम 3 साल का कोर्ट में वकालत का अनुभव जरूरी होगा।
- यह नियम निचली अदालतों के सिविल जज (जूनियर डिविजन) की भर्तियों पर लागू होगा।
- सभी राज्य सरकारें और उच्च न्यायालय अपने-अपने सेवा नियमों में संशोधन करें ताकि इस नए मानक को लागू किया जा सके।
🔍 फैसले के पीछे की वजह:
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के पीछे कई उच्च न्यायालयों द्वारा दी गई रिपोर्टों और जमीनी अनुभवों का हवाला दिया:
- बिना अनुभव वाले युवा जजों को कोर्ट की कार्यवाही और व्यवहारिक पहलुओं की समझ नहीं होती, जिससे न्यायिक गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- कुछ जजों को व्यवहारिक मामलों की सुनवाई में कठिनाइयाँ आती हैं, जो न्यायिक दक्षता को नुकसान पहुंचाती हैं।
- कोर्ट रूम एक्सपोज़र न होने के कारण कई जजों को शुरुआत में ही गलत निर्णय या व्यवहारिक गलती करने की आशंका बनी रहती है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा –
“प्रैक्टिकल कोर्ट एक्सपीरियंस जजों के लिए अनिवार्य है। इससे न्यायिक दक्षता और समझ में सुधार आता है।”
👩⚖️ अब तक क्या था नियम?
अब तक कई राज्यों में लॉ ग्रेजुएट्स को सीधा सिविल जज बनने की अनुमति थी, बशर्ते वे एलएलबी (LLB) पूरी कर चुके हों और कुछ स्थानों पर सिर्फ बार काउंसिल में पंजीकरण पर्याप्त माना जाता था।
लेकिन इस फैसले के बाद अब देशभर में एक 統一 मानक लागू होगा।
📢 ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन की याचिका का क्या मकसद था?
ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन (AIJA) ने याचिका दायर कर यह मांग की थी कि:
- कोर्ट में काम का अनुभव न रखने वाले जज कई बार अनुचित या गलत निर्णय लेते हैं।
- इससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास डगमगाता है।
- इसलिए न्यूनतम 3 वर्ष का अधिवक्ता अनुभव आवश्यक किया जाए।
🗂️ राज्य सरकारों और उच्च न्यायालयों को आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा कि:
- सभी राज्यों की सरकारें और हाईकोर्ट सेवा नियमों में संशोधन करें।
- 3 साल के अनुभव के बिना कोई भी उम्मीदवार सिविल जज (जूनियर डिविजन) की परीक्षा में नहीं बैठ सकेगा।
📈 क्या होगा इसका प्रभाव?
➤ पॉजिटिव:
- कोर्ट में व्यावसायिक अनुभव के साथ आने वाले जज ज्यादा सक्षम होंगे।
- न्यायिक कार्यों की गुणवत्ता में सुधार आएगा।
- न्यायिक प्रक्रिया में व्यावहारिकता बढ़ेगी।
➤ नेगेटिव:
- फ्रेश लॉ ग्रेजुएट्स को अब 3 साल तक वकालत करनी होगी, जिससे करियर की शुरुआत में देरी हो सकती है।
- न्यायिक सेवा में भर्ती की गति धीमी हो सकती है।
🗨️ छात्रों और संस्थानों की प्रतिक्रिया:
- कानून के छात्रों में इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं। कुछ इसे न्याय की गुणवत्ता सुधारने वाला कदम मानते हैं, तो कुछ इसे रोज़गार में देरी का कारण बता रहे हैं।
- कानून विश्वविद्यालयों का कहना है कि अब उन्हें छात्रों को प्रैक्टिकल ट्रेनिंग और कोर्ट एक्सपोज़र पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
🔚
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत की न्यायिक प्रणाली में एक अहम सुधारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है। यह न केवल न्याय की गुणवत्ता को बढ़ाएगा बल्कि भविष्य के न्यायाधीशों को अनुभव से लैस करेगा। हालाँकि, लॉ ग्रेजुएट्स के लिए यह एक नई चुनौती भी है, जो अब सीधे अदालत की कुर्सी पर नहीं बैठ सकेंगे।
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