Aravalli पहाड़ियों को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने साफ और कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने जंगल सफारी जैसी योजनाओं पर फिलहाल ब्रेक लगाते हुए कहा कि जब तक अरावली रेंज की वैज्ञानिक और कानूनी परिभाषा तय नहीं होती, तब तक किसी तरह की गतिविधि आगे नहीं बढ़ेगी, न फाइलें, न मंजूरी।
Aravalli: सुप्रीप कोर्ट का सख्त संदेश
गुरुवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार की उस मांग को खारिज कर दिया, जिसमें जंगल सफारी के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) को सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी के सामने रखने की अनुमति मांगी गई थी। पीठ ने साफ कहा, “हम किसी को भी अरावली को छूने की इजाजत नहीं देंगे।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने संकेत दिया कि इस मुद्दे को मुख्य मामले के साथ ही सुना जाएगा, अलग-अलग नहीं।
Aravalli: एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट का इंतजार
अदालत ने कहा कि अरावली रेंज की सीमा और स्वरूप को लेकर अभी भी स्पष्टता नहीं है। जब तक विशेषज्ञ यह तय नहीं कर देते कि अरावली की वास्तविक परिभाषा क्या है, तब तक जंगल सफारी जैसे प्रोजेक्ट्स पर विचार नहीं किया जा सकता.पीठ में शामिल न्यायाधीशों ने माना कि पर्यावरण से जुड़े मामलों में जल्दबाजी भारी पड़ सकती है। एक बार गलत दिशा में कदम बढ़ा, तो नुकसान लौटकर नहीं आता।
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10,000 से 3,300 एकड़ तक सीमित करने की बात
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि प्रस्तावित जंगल सफारी का क्षेत्र पहले के मुकाबले काफी कम कर दिया गया है। वकील ने बताया कि 10,000 एकड़ की योजना को घटाकर 3,300 एकड़ तक सीमित किया गया है, और सरकार सिर्फ DPR को जांच के लिए आगे बढ़ाना चाहती है.लेकिन अदालत ने इस पर सवाल उठाए। बेंच ने कहा कि कई बार समितियों के सामने कागजों में सब कुछ “हरा-भरा” दिखाया जाता है, जबकि जमीन पर हालात कुछ और होते हैं। इसलिए सावधानी जरूरी है।
सिर्फ हरियाणा की नहीं, देश की धरोहर
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अरावली केवल किसी एक राज्य की संपत्ति नहीं है। यह एक ऐसी पर्वत श्रृंखला है जो कई राज्यों से होकर गुजरती है और जिसका पर्यावरणीय महत्व पूरे देश के लिए है.अदालत ने अंत में साफ किया कि एक्सपर्ट कमेटी की राय आने के बाद ही जंगल सफारी परियोजना पर कोई फैसला लिया जाएगा। तब तक, अरावली के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की अनुमति नहीं होगी।
