नीरज पांडे की ‘सिकंदर का मुकद्दर’ फिल्म ने अपनी रिलीज़ के बाद काफी चर्चा बटोरी है। इस फिल्म का नाम सुनकर कई लोगों को 1978 की फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ और ‘शराबी’ का एक सीन याद आ गया, जिसमें अमिताभ बच्चन कहते हैं, “एक वो थे, एक आप हैं।” नीरज पांडे ने इस फिल्म में भी कुछ ऐसा ही असरदार तरीका अपनाया है, लेकिन कहानी और प्रस्तुति में काफी बदलाव किया है।
नई सोच और कहानी
नीरज पांडे की ‘सिकंदर का मुकद्दर’ में एक नई सोच और यथार्थ दिखाने की कोशिश की गई है। पांडे की फिल्म थ्रिलर है, लेकिन इसमें शातिर दिमाग और दिलचस्प मोड़ हैं। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी गलतियों और संघर्षों से जूझते हुए अपनी जिंदगी को संभालने की कोशिश करता है। पांडे ने फिल्म को एक नए अंदाज में पेश किया है, जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देता है।
कहानी का संघर्ष
फिल्म की कहानी में सिकंदर शर्मा (अविनाश तिवारी), कामिनी सिंह (तमन्ना भाटिया) और मंगेश देसाई (राजीव मेहता) पर 50-60 करोड़ के हीरे चोरी का आरोप है। वे इस आरोप से बचने के लिए कानूनी और सामाजिक लड़ाई लड़ते हैं। वहीं पुलिस अधिकारी जसविंदर सिंह (जिमी शेरगिल) की जिद है कि वह इनसे चोरी का राज़ खोलकर ही रहेगा।
क्या है फिल्म की खासियत?
फिल्म में घटनाओं का क्रम बार-बार बदलता है, जिससे दर्शक चौंक जाते हैं। नीरज पांडे ने फिल्म में कुछ नए ट्विस्ट और मोड़ दिए हैं, जो उसे एक अलग ही स्तर पर ले जाते हैं। हालांकि, फिल्म में कुछ बातें अस्पष्ट हैं और कई बार कहानी में उलझन भी होती है।
निष्कर्ष
‘सिकंदर का मुकद्दर’ एक थ्रिलर फिल्म है, जिसमें दर्शकों को नए विचार और एक अलग तरीके की कहानी देखने को मिलती है। फिल्म को लेकर दर्शकों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन नीरज पांडे ने कोशिश की है कि वह कुछ नया और दिलचस्प दिखा सकें। यह फिल्म बर्बाद या आबाद, यह इस बात पर निर्भर करता है कि दर्शक इसे कितनी अच्छी तरह समझ पाते हैं।
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