दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उन्होंने सुबह 8:56 बजे अंतिम सांस ली
आज सुबह जैसे ही ये खबर आई कि झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड आंदोलन के प्रणेता शिबू सोरेन अब इस दुनिया में नहीं रहे, पूरा राज्य और देश शोक में डूब गया। दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उन्होंने सुबह 8:56 बजे अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार थे और जिंदगी से जंग लड़ रहे थे। उनकी उम्र, पुरानी बीमारियाँ और हाल ही में आया ब्रेन स्ट्रोक आखिरकार उन्हें हमसे छीन ले गया।

किडनी और फेफड़ों की बीमारी
डॉक्टर एके भल्ला, जो सर गंगाराम अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग के चेयरमैन हैं, उन्होंने बताया कि शिबू सोरेन जी को किडनी और फेफड़ों की पुरानी बीमारी थी। डायबिटीज और हाल ही में हुई बायपास सर्जरी की वजह से उनकी रिकवरी और भी मुश्किल होती जा रही थी। कुछ दिन पहले आए ब्रेन स्ट्रोक ने उनकी हालत और बिगाड़ दी थी।
वे पिछले कई दिनों से ICU में वेंटिलेटर पर थे। बेटे और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन उनके पास ही दिल्ली में रुके हुए थे। पूरे सप्ताह अस्पताल के बाहर नेताओं का तांता लगा रहा सभी को उम्मीद थी कि ‘गुरुजी’ (जैसा उन्हें प्यार से बुलाया जाता था) फिर एक बार जूझकर बाहर आएंगे। लेकिन इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया।
आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं।
आज मैं शून्य हो गया हूँ…
— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) August 4, 2025
शिबू सोरेन की कहानी
शिबू सोरेन का नाम सिर्फ राजनीति से नहीं जुड़ा था, वह झारखंड की आत्मा थे। उन्होंने एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया, जिसने आदिवासी समुदाय की पहचान को आवाज़ दी। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने, केंद्र में मंत्री रहे और राज्यसभा में भी झारखंड की आवाज़ को बुलंद करते रहे।
उनकी राजनीति सिर्फ कुर्सी तक सीमित नहीं थी वह धरती पुत्र थे। जंगल, जमीन और जल के लिए उन्होंने लड़ाइयाँ लड़ीं, जेल गए, और आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए कभी झुके नहीं।

बेटे हेमंत ने शेयर की यादें
जब हेमंत सोरेन ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा
“पिताजी के जाने से मैं शून्य हो गया हूं”
तो यह सिर्फ एक बेटे का दुख नहीं था, यह झारखंड के हर उस व्यक्ति की आवाज़ थी, जिसने शिबू सोरेन में एक पिता, एक मार्गदर्शक, एक लड़ाकू देखा।
आज उनके घर में सन्नाटा है, लेकिन उनकी यादें पूरे झारखंड में गूंज रही हैं। गांव-गांव में लोग उन्हें याद कर रहे हैं। एक बुजुर्ग आदिवासी महिला ने टीबी चैनल से बात करते हुए कहा
“वो हमारे लिए नेता नहीं, मसीहा थे। उन्होंने जंगल बचाया, हमें जमीन दी।”
हमने एक राजनीतिक नेता नहीं, बल्कि एक विचार खोया है। वो विचार जो कहता था “हम आदिवासी हैं, और हमें किसी से कम मत समझो।”
शिबू सोरेन की सबसे बड़ी विरासत है उनका संघर्ष बेबाक, ईमानदार और हमेशा अपने लोगों के लिए।
झारखंड की राजनीति में शिबू सोरेन की कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता, पर उनकी विरासत उनके विचार, संघर्ष और आदिवासी अस्मिता के लिए उनका जज़्बा आने वाली पीढ़ियों को राह दिखाएगा।
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